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Aman Mishra
vo
vo | "वो"
- Aman Mishra
"वो"
उसके
ख़यालों
की
डोर
मन
में
बसी
एक
डोर
की
तरह,
न
किसी
की
चिंता,न
किसी
का
डर,
बस
वो,
उसके
ख़याल
उसकी
बात,
मन
में
गूंजे
जैसे
मीठी
धुन
कोई
- Aman Mishra
मैं
क्या
कहूँ
के
मुझे
सब्र
क्यूँँ
नहीं
आता
मैं
क्या
करूँँ
के
तुझे
देखने
की
आदत
है
Ahmad Faraz
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मिले
थे
फरवरी
में
आपसे
पहली
दफ़ा
हम
तभी
से
दोस्ती
सी
हो
गई
है
फरवरी
से
Bhaskar Shukla
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ये
सोच
कर
के
वो
खिड़की
से
झाँक
ले
शायद
गली
में
खेलते
बच्चे
लड़ा
दिए
मैंने
Unknown
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सौ
सौ
उमीदें
बँधती
है
इक
इक
निगाह
पर
मुझ
को
न
ऐसे
प्यार
से
देखा
करे
कोई
Allama Iqbal
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न
कोई
बीन
बजाई
न
टोकरी
खोली
बस
एक
फोन
मिलाने
पे
साँप
बैठा
है
कोई
भी
लड़की
अकेली
नज़र
नहीं
आती
यहाँ
हर
एक
ख़जाने
पे
साँप
बैठा
है
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Muzdum Khan
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उस
के
पहलू
से
लग
के
चलते
हैं
हम
कहीं
टालने
से
टलते
हैं
Jaun Elia
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फिर
इस
के
बाद
मनाया
न
जश्न
ख़ुश्बू
का
लहू
में
डूबी
थी
फ़स्ल-ए-बहार
क्या
करते
Azhar Iqbal
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यूँँ
बार
बार
मुझ
को
सदाएँ
न
दीजिए
अब
वो
नहीं
रहा
हूँ
कोई
दूसरा
हूँ
मैं
Azm Shakri
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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शहर
का
तब्दील
होना
शाद
रहना
और
उदास
रौनक़ें
जितनी
यहाँ
हैं
औरतों
के
दम
से
हैं
Muneer Niyazi
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