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Shivsagar Sahar
asar bazaar ka itnaa hua is aadhunik yug men
asar bazaar ka itnaa hua is aadhunik yug men | असर बाज़ार का इतना हुआ इस आधुनिक युग में
- Shivsagar Sahar
असर
बाज़ार
का
इतना
हुआ
इस
आधुनिक
युग
में
कि
कोई
भूलकर
करता
नहीं
दातून
की
बातें
जवानी
में
भी
बचपन
की
उमंगे
जाग
उठती
हैं
करें
मासूम
बच्चे
जब
किसी
बैलून
की
बातें
- Shivsagar Sahar
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इंसानों
को
जलवाएगी
कल
इस
से
ये
दुनिया
जो
बच्चा
खिलौना
भी
ज़मीं
पर
नहीं
रखता
Munawwar Rana
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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मैं
तेरी
गोद
में
कैसा
लगा
था
माँ
तेरा
तो
दूसरा
बचपन
हुआ
था
मैं
Rohit tewatia 'Ishq'
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तुम
माँग
रहे
हो
मेरे
दिल
से
मेरी
ख़्वाहिश
बच्चा
तो
कभी
अपने
खिलौने
नहीं
देता
Abbas Tabish
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मिरी
जो
शख़्सियत
है
उसको
माँ
ने
ही
तराशा
है
मिरा
बचपन
जहाँ
बीता
था
उस
घर
का
किराया
हूँ
Amaan Pathan
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लटकन
झटकन
ओढ़
मटकते
एक
परी
का
दिख
जाना,
प्लेन
गुजरने
पर
बचपन
के
ख़ुश
होने
सा
लगता
है!
बिन्दी,
लिपस्टिक,
चूड़ी,
कंगन
और
किनारा
साड़ी
का,
लाल
कलर
पर
कब्ज़ा
अय
हय
कितना
अच्छा
लगता
है!
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Atul K Rai
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घर
लौट
के
रोएँगे
माँ
बाप
अकेले
में
मिट्टी
के
खिलौने
भी
सस्ते
न
थे
मेले
में
Qaisar-ul-Jafri
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बचपन
से
ख़ुद
पे
दाँव
लगाते
रहे
हैं
हम
सीखी
है
खेल
खेल
में
हमने
शनावरी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मुहब्बत
याद
बचपन
की
नहीं
है
कवर
टॉफी
का
लेकिन
पास
में
है
Tanoj Dadhich
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आज
फिर
माँ
मुझे
मारेगी
बहुत
रोने
पर
आज
फिर
गाँव
में
आया
है
खिलौने
वाला
Nawaz Zafar
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पहले
ख़ाके
में
रंग
भरना
है
फिर
तेरे
बाल-ओ-पर
कतरना
है
आपसे
इश्क़
हो
गया
है
पर
मुझको
इस
बात
से
मुकरना
है
बद-तमीज़ी
मुझे
भी
आती
है
काम
लेकिन
नहीं
ये
करना
है
आप
सब
जाइए
हवेली
में
झोपड़ी
में
मुझे
ठहरना
है
तू
है
कुंदन
तो
आग
ही
में
जल
इस
सेे
ज़्यादा
अभी
निखरना
है
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Shivsagar Sahar
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यहाँ
इंसान
को
इंसान
बनने
की
ज़रूरत
है
तो
फिर
क्यूँ
लोग
करते
हैं
हमेशा
ख़ून
की
बातें
ज़मीं
दो
गज़
ज़फ़र
क्यूँ
माँगता
अहबाब
से
अपने
उसे
अच्छी
लगी
होतीं
अगर
रंगून
की
बातें
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Shivsagar Sahar
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अरे
कैसे
वतन
को
छोड़
दें
हम
यहाँ
पर
ख़ून
है
शामिल
हमारा
Shivsagar Sahar
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मिरी
ज़बान
से
अल्फ़ाज़
कोई
निकले
गर
तिरी
ज़बान
सा
अंदाज़-ए-गुफ़्तगू
आए
Shivsagar Sahar
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लाश
मेरी
जल
रही
है
साँस
लेकिन
चल
रही
है
ग़मज़दा
हूँ
इसलिए
मैं
ज़िन्दगी
दलदल
रही
है
चाँदनी
की
गुफ़्तुगू
भी
ख़ुशनुमा
हर
पल
रही
है
ग़म
मुसलसल
आ
रहे
हैं
जो
ख़ुशी
थी
टल
रही
है
दौर
जैसा
भी
रहा
हो
ज़िन्दगी
चंचल
रही
है
इसलिए
रौशन
हैं
आँखें
माँ
मेरा
काजल
रही
है
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Shivsagar Sahar
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