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Shivansh Singhaniya
noor barsa hai kis aashiyaan se
noor barsa hai kis aashiyaan se | नूर बरसा है किस आशियाँ से
- Shivansh Singhaniya
नूर
बरसा
है
किस
आशियाँ
से
धूप
आती
है
महविश
कहाँ
से
अब
न
हमको
तलाशा
करो
तुम
हम
फ़ना
हो
गए
है
जहाँ
से
है
निगोड़ी
मोहब्बत
ये
कैसी
गुफ़्तूगू
कर
रहा
रफ्तगाँ
से
तू
गुमाँ
कर
न
अपनी
जबीं
पर
दास्ताँ
बन
गई
दास्ताँ
से
तुम
न
रूठो
मोहब्बत
से
इतना
उठ
चले
हम
तेरे
आस्ताँ
से
उम्र
भर
क़ैद
दिल
में
रहेंगे
हम
न
उफ़
भी
करेंगे
ज़बाँ
से
रात
है
जाम-ख़ोशा-ए-महफ़िल
ख़ूब
गुज़री
है
पीर-ए-मुग़ाँ
से
अश्क-ए-दीदा
हुए
इश्क़-ए-ग़ाफ़िल
ज़हर
उतरा
नहीं
जिस्म-ओ-जाँ
से
तुम
बताओ
मैं
जाऊँ
कहाँ
अब
शिव
गया
हार
इस
इम्तिहाँ
से
- Shivansh Singhaniya
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हम
मेहनतकश
इस
दुनिया
से
जब
अपना
हिस्सा
माँगेंगे
इक
बाग़
नहीं,
इक
खेत
नहीं,
हम
सारी
दुनिया
माँगेंगे
Faiz Ahmad Faiz
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चलो
ऐ
हिंद
के
सैनिक
कि
लहराएँ
तिरंगा
हम
जिसे
दुनिया
नमन
करती
है
उस
पर्वत
की
चोटी
पर
ATUL SINGH
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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तुम
आसमान
पे
जाना
तो
चाँद
से
कहना
जहाँ
पे
हम
हैं
वहाँ
चांदनी
बहुत
कम
है
Shakeel Azmi
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इस
दौर
के
मर्दों
की
जो
की
शक्ल-शुमारी
साबित
हुआ
दुनिया
में
ख़्वातीन
बहुत
हैं
Sarfaraz Shahid
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अपना
सब
कुछ
हार
के
लौट
आए
हो
न
मेरे
पास
मैं
तुम्हें
कहता
भी
रहता
था
कि
दुनिया
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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हम
क्या
करें
अगर
न
तिरी
आरज़ू
करें
दुनिया
में
और
भी
कोई
तेरे
सिवा
है
क्या
Hasrat Mohani
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अपनी
दुनिया
भी
चल
पड़े
शायद
इक
रुका
फ़ैसला
किया
जाए
Madan Mohan Danish
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जहाँ
जो
था
वहीं
रहना
था
उस
को
मगर
ये
लोग
हिजरत
कर
रहे
हैं
Liaqat Jafri
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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दर्द
इक
छिपा
रखा
था
कब
से
हम
ने
सीने
में
इक
दिया
जला
हुआ
वो
फूँक
कर
बुझा
गया
Shivansh Singhaniya
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इश्क़
हस्ब-ए-हाल
समझा
ही
नहीं
तुमने
कभी
हासिदों
से
उभरा
हूँ
फिर
हादसों
के
दरमियाँ
Shivansh Singhaniya
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कुछ
लोग
जुड़े
है
उस
औरत
के
ही
आँगन
में
शौहर
के
गुनाहों
को
जो
सब
से
छिपाती
है
Shivansh Singhaniya
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इश्क़
तरसा
हुआ
बनाऊँगा
ग़म
को
हँसता
हुआ
बनाऊँगा
इक
नया
सा
मकान
तो
होगा
जो
मैं
गिरता
हुआ
बनाऊँगा
नक्श-चेहरा
बसा
था
आँखों
में
सो
वो
रोता
हुआ
बनाऊँगा
देख
सूरज
कि
उस
जलन
को
मैं
अक्स
जलता
हुआ
बनाऊँगा
कल
के
किस
इंतज़ार
में
है
तू
कल
तो
बीता
हुआ
बनाऊँगा
इक
घड़ी
हाथ
पर
तो
होगी
शिव
वक़्त
ठहरा
हुआ
बनाऊँगा
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Shivansh Singhaniya
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रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
साक़ी
पिला
न
जाम
मदद-गार
की
तरह
Shivansh Singhaniya
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