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Shajar Abbas
arsh se aayi hooñ main aayat-e-mutlaq ki tarah
arsh se aayi hooñ main aayat-e-mutlaq ki tarah | अर्श से आई हूँ मैं आयत-ए-मुतलक़ की तरह
- Shajar Abbas
अर्श
से
आई
हूँ
मैं
आयत-ए-मुतलक़
की
तरह
क़ल्ब-ए-हाज़िर
पे
कोई
अपने
उतारे
मुझको
- Shajar Abbas
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कहता
है
ये
इंसान
से
इंसान
मुबारक
हम
क्यूँ
न
कहें
आपसे
फिर
जान
मुबारक
आती
है
सदा
दिल
से
शजर
मेरे
निकलकर
हो
जान-ए-तमन्ना
को
ये
रमज़ान
मुबारक
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Shajar Abbas
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वो
उसके
गाल
पे
दरबान-ए-हुस्न
बैठा
है
कोई
उसे
सुनो
तिल
का
निशान
मत
कहना
Shajar Abbas
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दिल
में
जो
बात
थी
उस
बात
को
कह
सकते
थे
तुम
अगर
चाहते
हम
साथ
में
रह
सकते
थे
इसलिए
हमने
बिछड़ने
को
ही
बेहतर
समझा
आपके
और
मज़ालिम
नहीं
सह
सकते
थे
आपको
हज़रत-ए-दिल
इल्म
नहीं
है
इसका
आप
तूफ़ान-ए-मुहब्बत
में
भी
बह
सकते
थे
आज
गर
तैश
में
आ
जाते
शजर
और
साहिल
शहर
के
ऊँचे
मकानात
ये
ढह
सकते
थे
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Shajar Abbas
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यूँँ
लग
रहा
है
क़तरा-ए-मय
लब
पर
आपके
जैसे
किसी
गुलाब
की
पत्ती
पर
ओस
हो
Shajar Abbas
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हम
तो
हाथों
से
सँवारे
हैं
बदन
फूलों
का
और
कुछ
लोग
हैं
फूलों
को
मसल
देते
हैं
Shajar Abbas
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