हरम हो या सनम- ख़ाना कहीं भी दिल नहीं लगता

  - Shadab Shabbiri
हरमहोयासनम-ख़ानाकहींभीदिलनहींलगता
जहाँभीहोचलेआनाकहींभीदिलनहींलगता
वोमस्जिदहोकिमय-ख़ानाकहींभीदिलनहींलगता
अरेवोजान-ए-जानानाकहींभीदिलनहींलगता
अगरसमझातोयेसमझाकिअबतककुछनहींसमझा
अगरजानातोयेजानाकहींभीदिलनहींलगता
यहाँमैंहूँवहाँतुमहोवहाँतुमहोयहाँमैंहूँ
चलेआनाशर्मानाकहींभीदिलनहींलगता
सुराहीहाथमेंलेकरकहाँजाताहैसाक़ी
इधरलाभरदेपैमानाकहींभीदिलनहींलगता
वहीमैंहूँवहीतुमहोवहीघरहैवहीदरहै
वहीहैमेराकाशानाकहींभीदिलनहींलगता
जनाब-ए-शैख़सेशादाबहमकहकरख़ुदाहाफ़िज़
चलेहैंसू-ए-मय-ख़ानाकहींभीदिलनहींलगता
  - Shadab Shabbiri
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