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Surendra Bhatia "Salil"
vo bas ik ret hai jo chhoot jaati hai hatheli se
vo bas ik ret hai jo chhoot jaati hai hatheli se | वो बस इक रेत है जो छूट जाती है हथेली से
- Surendra Bhatia "Salil"
वो
बस
इक
रेत
है
जो
छूट
जाती
है
हथेली
से
मैं
दुनिया
जीत
कर
भी
क़ैद
उसको
रख
नहीं
सकता
अभी
है
जो
है
जी
लो
ज़िन्दगी
है
आग
पर
पानी
हवा
हो
जाएगी
कल
चाह
भी
फिर
चख
नहीं
सकता
- Surendra Bhatia "Salil"
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तरन्नुम
साज़
का
मेरे
उसे
नासाज़
लगता
है
मेरी
ख़ामोशियों
में
भी
उसे
इक
राज़
लगता
है
ख़ुदा
अब
बख़्श
भी
दे
दिल
को
मेरे
उल्फ़तें
उसकी
तुझे
भी
रास
आता
उसका
ही
अंदाज़
लगता
है
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आँख
में
मोती
दबा
कर
सो
जाते
हैं
हाथ
का
तकिया
बना
कर
सो
जाते
हैं
घर
से
इतनी
दूर
माँ
की
यादें
लिए
ख़ुद
ही
ख़ुद
को
थपथपा
कर
सो
जाते
हैं
ख़्वाब
चुभते
हैं
तो
उठते
हैं
चौंक
कर
और
फिर
से
कसमसा
कर
सो
जाते
हैं
सोचते
हैं
हम
से
तो
बेहतर
हैं
शजर
जागते
है
लहलहा
कर
सो
जाते
हैं
सुब्ह
होते
भागते
हैं
ग़म
से
परे
रात
उसके
पास
जाकर
सो
जाते
हैं
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वो
क़ातिल
फेर
कर
नज़रें
बड़ा
एहसान
करता
है
अभी
तक
हम
जो
ज़िन्दा
हैं
उसी
की
मेहरबानी
है
Surendra Bhatia "Salil"
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वही
जज़्बा-ए-साहिल
तोड़ने
को
लश्कर-ए-मौजाँ
समुंदर
तुझ
से
तो
कुछ
और
ही
उम्मीद
थी
मुझको
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इस
क़दर
दर-बदर
नहीं
थे
हम
जब
तेरे
हम-सफ़र
नहीं
थे
हम
सूनी
रंगीन
गलियाँ
तकती
थीं
पिछली
होली
भी
घर
नहीं
थे
हम
इक
मोहब्बत
थी
उसको
भी
भूले
इश्क़
में
कार-गर
नहीं
थे
हम
ख़ुद
को
रस्ते
में
आज
खो
आए
इतने
तो
बे-ख़बर
नहीं
थे
हम
तेरी
दुनिया
के
दो
सिरे
हम
थे
हम
समझते
थे
पर
नहीं
थे
हम
मर्ज़
बस
तेरा
ला-दवा
था
इक
वैसे
कम
चारा-गर
नहीं
थे
हम
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