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Surendra Bhatia "Salil"
safar men haath chhode ja raha hai
safar men haath chhode ja raha hai | सफ़र में हाथ छोड़े जा रहा है
- Surendra Bhatia "Salil"
सफ़र
में
हाथ
छोड़े
जा
रहा
है
तू
कैसे
ख़्वाब
तोड़े
जा
रहा
है
अभी
पहचान
भी
पाया
नहीं
मैं
तू
अपनी
शक्ल
छोड़े
जा
रहा
है
ख़बर
आगे
ही
बढ़ती
जा
रही
है
हर
इक
दो
चार
जोड़े
जा
रहा
है
ख़ुदा
भी
ना-ख़ुदा
भी
मेरी
कश्ती
भँवर
की
ओर
मोड़े
जा
रहा
है
अभी
तो
इश्क़
की
बस
इब्तिदा
थी
अभी
से
दिल
ये
दौड़े
जा
रहा
है
सलिल
आ
जाएगा
ढब
शा'इरी
का
अभी
क्यूँ
आस
छोड़े
जा
रहा
है
- Surendra Bhatia "Salil"
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वो
अब
आँखों
का
तारा
हो
गया
है
फ़लक
सारे
का
सारा
हो
गया
है
किसी
से
थी
उसे
पहले
मोहब्बत
वो
अब
पूरा
हमारा
हो
गया
है
नदी
सागर
से
मिल
कर
पूछती
है
तू
कैसे
इतना
खारा
हो
गया
है
मक़ाम-ए-आख़िरी
तक
आ
गए
हैं
मोहब्बत
में
ख़सारा
हो
गया
है
रक़ीबों
से
सुने
हैं
ख़्वाब
उसके
हमारा
पारा
पारा
हो
गया
है
जब
उसने
हाथ
छोड़ा
तब
लगा
ये
मेरा
दिल
बेसहारा
हो
गया
है
कुशल
तुम
पूछते
थे
तो
बता
दूँ
मोहब्बत
से
गुज़ारा
हो
गया
है
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उसने
जिस
दिन
से
मुझको
खोया
है
फिर
कभी
चैन
से
न
सोया
है
तुम
जिसे
सोच
भी
नहीं
सकते
रोज़
यादों
में
मेरी
रोया
है
ज़िन्दगी
भर
फलेगा
इश्क़
इस
पर
बीज
मैंने
भी
ऐसा
बोया
है
मेरे
हाथों
पे
इतनी
कालिख
है
'आदतन
कोई
ज़ख़्म
धोया
है
जिसने
बस्ता
उठाना
था
उसने
ज़िन्दगी
तेरा
भार
ढोया
है
तू
ही
तन्हा
नहीं
मोहब्बत
ने
मेरा
तकिया
भी
तो
भिगोया
है
आँख
मूँदे
'सलिल'
सुकूँ
में
है
बाद
मुद्दत
के
आज
सोया
है
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वो
क़ातिल
फेर
कर
नज़रें
बड़ा
एहसान
करता
है
अभी
तक
हम
जो
ज़िन्दा
हैं
उसी
की
मेहरबानी
है
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अभी
तक
खोया
रहता
हूँ
ख़यालों
में
उसी
के
मैं
था
पहले
उसका
'आशिक़
अब
हूँ
उसकी
बेवफ़ाई
का
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पता
जब
तक
नहीं
पक्का
हमारा
वही
मंज़िल
वही
रस्ता
हमारा
थी
जिस
से
आस
वो
मुँह
फेर
बैठा
निकल
पाया
नहीं
पर्चा
हमारा
कहानी
सुन
के
सब
उठ
ही
रहे
थे
किसी
ने
पढ़
लिया
चेहरा
हमारा
अभी
बचपन
के
कुछ
सपने
हैं
बाक़ी
अभी
भारी
है
ये
बस्ता
हमारा
हमें
हालात
ने
ऐसे
निचोड़ा
लहू
से
बन
गया
ख़ाका
हमारा
नज़र-अंदाज़
करना
ही
पड़ा
फिर
कोई
'आशिक़
था
बेचारा
हमारा
समझती
थी
जो
लड़की
हमको
पागल
वही
तकती
है
अब
रस्ता
हमारा
तुम्हीं
ने
हमको
सौदाई
बनाया
मोहब्बत
था
नहीं
पेशा
हमारा
'सलिल'
इक
उम्र
गुज़री
अब
तो
शायद
नहीं
करता
हो
वो
चर्चा
हमारा
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