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Ritika reet
nafratoin men kisi se ishq kiya hai hamne
nafratoin men kisi se ishq kiya hai hamne | नफ़रतों में किसी से इश्क़ किया है हमने
- Ritika reet
नफ़रतों
में
किसी
से
इश्क़
किया
है
हमने
फूल
को
छोड़
के
कांटो
को
चुना
है
हमने
- Ritika reet
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मुनफ़रिद
ख़ुशबू
है
इस
शजर
की
ऐसा
लगता
है
उसने
छुआ
हो
Shadab khan
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ये
तेरा
गुलिस्ताँ
तेरा
चमन
कब
मेरी
नवा
के
क़ाबिल
है
नग़्मा
मिरा
अपने
दामन
में
आप
अपना
गुलिस्ताँ
लाता
है
Ali Sardar Jafri
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इन
हवाओं
में
ज़रा
सी
ख़ुशबू
हज़रत
घोलिए
थोड़ी
हिंदी
थोड़ी
सी
उर्दू
यहाँ
पर
बोलिए
Navneet krishna
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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मैंने
बस
इतना
पूछा
था
क्या
देखते
हो
भला
मैंने
ये
कब
कहा
था
मुझे
देखना
छोड़
दो
गीली
मिट्टी
की
ख़ुशबू
मुझे
सोने
देती
नहीं
मेरे
बालों
में
तुम
उँगलियाँ
फेरना
छोड़
दो
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Tajdeed Qaiser
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महक
उठे
रंग-ए-सुर्ख़
जैसे
खिले
चमन
में
गुलाब
इतने
Muneer Niyazi
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यूँँ
लगे
दोस्त
तिरा
मुझ
से
ख़फ़ा
हो
जाना
जिस
तरह
फूल
से
ख़ुशबू
का
जुदा
हो
जाना
Qateel Shifai
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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अपने
होंटों
से
कहो
फूल
को
चू
में
हर
रोज़
जब
मेरे
लब
नहीं
होंगे
तो
सहूलत
होगी
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Shahbaz Rizvi
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सो
देख
कर
तेरे
रुख़्सार-ओ-लब
यक़ीं
आया
कि
फूल
खिलते
हैं
गुलज़ार
के
अलावा
भी
Ahmad Faraz
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आँख
से
टपका
था
रेज़ा
दर्द
का
हाथ
में
मेरे
था
तारा
दर्द
का
ख़ुशनसीबी
समझो
या
फिर
हादसा
मैंने
कल
देखा
था
चेहरा
दर्द
का
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साथ
उसका
जावेदाना
चाहिए
यानी
मुझको
क़ैद-खाना
चाहिए
कब
तलक
बन
कर
मुसाफ़िर
ही
रहे
अब
हवा
को
भी
ठिकाना
चाहिए
इक
घड़ी
को
भी
नहीं
रुकती
नदी
तुमको
भी
मिलना-मिलाना
चाहिए
हाल
पर
मेरे
कभी
हंँसता
नहीं
आईने
से
दिल
लगाना
चाहिए
हर
किसी
को
बे-दिली
हासिल
नहीं
लुत्फ़
इनका
भी
उठाना
चाहिए
सब
नसीहत
है
यहाँ
सच्ची
मगर
इश्क़
में
मिटना-मिटाना
चाहिए
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क्या
मुसीबत
ये
फिर
खड़ी
कर
ली
हिज्र
से
तुमने
दोस्ती
कर
ली
जुगनुओं
को
निकाला
आँगन
से
ज़िन्दगी
फिर
से
बरहमी
कर
ली
है
नशा
ये
नई
मोहब्बत
का
दोस्तों
से
भी
दुश्मनी
कर
ली
तुम
न
आए
तो
हमने
भी
देखो
है
अँधेरों
से
दोस्ती
कर
ली
तुम
सेे
कह
ना
सके
ग़म-ए-दिल
को
हमने
लेकिन
ये
शा'इरी
कर
ली
हादसा
ये
नसीब
ही
में
था
सोचकर
हमने
वापसी
कर
ली
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सदा
बे-दिली
ही
मिली
तो
हुआ
क्या
हमें
भी
मगर
मुस्कुराना
नहीं
है
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रहनुमा
है
जो
रूठ
कर
आए
ढूँढते
उनको
दर-ब-दर
आए
आज
सजदे
में
ये
दु'आ
माँगी
याद
भी
उनकी
उम्र-भर
आए
मौत
के
अब
गले
लगेंगे
हम
लौटकर
फिर
न
वो
अगर
आए
लगता
शायद
है
आख़िरी
दिन
ये
घर
को
मेरे
है
चारा-गर
आए
है
गुज़ारिश
ख़ुदास
ये
मेरी
रूठ
कर
ही
मगर
वो
घर
आए
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