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Ravi 'VEER'
kitne aashiq dher hue hain aankhoñ par
kitne aashiq dher hue hain aankhoñ par | कितने 'आशिक़ ढेर हुए हैं आँखों पर
- Ravi 'VEER'
कितने
'आशिक़
ढेर
हुए
हैं
आँखों
पर
उतने
जितने
शे'र
हुए
हैं
आँखों
पर
- Ravi 'VEER'
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क्या
हो
गर
गुमनाम
ख़ज़ाने
मिल
जाएँ
यानी
फिर
वो
यार
पुराने
मिल
जाएँ
जिनके
साथ
में
गुज़रा
बचपन
सारा,
वो
मिल
जाएँ
तो
यार
ज़माने
मिल
जाएँ
मंज़िल
की
ख़ातिर
जो
निकले
हैं
घर
से
उनको
मंज़िल
ठौर
ठिकाने
मिल
जाएँ
चाय
के
प्याले
भी
करते
हैं
याद
उन्हें
कहते
हैं
इक
बार
दीवाने
मिल
जाएँ
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Ravi 'VEER'
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रात
भर
तुम
तो
सुकूँ
की
नींद
में
सोते
रहे
पर
सुकूँ
की
धज्जियाँ
मैंने
उड़ाईं
रात
भर
Ravi 'VEER'
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अब
तक
मेरा
प्यार
नहीं
देखा
उसने
यानी
कुछ
भी
यार
नहीं
देखा
उसने
यूँँ
तो
मुझको
देखा
है
लेकिन
मेरी
आँखों
में
इक
बार
नहीं
देखा
उसने
हर-दम
मेरी
हँसती
सूरत
देखी
पर
भीतर
का
आज़ार
नहीं
देखा
उसने
डरता
हूँ,
वो
सीधी-सादी
लड़की
है
जिस्मों
का
व्यापार
नहीं
देखा
उसने
पहले
तो
वो
हर-दिन
मिलने
आती
थी
पहले
तो
इतवार
नहीं
देखा
उसने
?
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Ravi 'VEER'
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मुझे
लगता
रहा
रस्ते
बहुत
आसान
होंगे
पर
चला
जब
मैं
तो
काँटे
फूल
से
ज़्यादा
मिले
मुझको
Ravi 'VEER'
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सब
सेे
अच्छा
रह
कर
मैंने
ये
जाना
अपना
ही
अपनों
से
धोखा
करता
है
फूल
तो
ख़ंजर
कुछ
पल
में
हो
जाते
हैं
ख़ंजर
लेकिन
फूल
नहीं
बन
सकता
है
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Ravi 'VEER'
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