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Raunak Karn
na KHud ko nazar men giraa hi sake hamna KHud ko kahii pe bitha hi sake ham
na KHud ko nazar men giraa hi sake hamna KHud ko kahii pe bitha hi sake ham | न ख़ुद को नज़र में गिरा ही सके हम
- Raunak Karn
न
ख़ुद
को
नज़र
में
गिरा
ही
सके
हम
न
ख़ुद
को
कही
पे
बिठा
ही
सके
हम
बिना
दोस्ती
के
कटी
उम्र
सारी
न
तो
ज़ख़्म
दिल
के
दिखा
ही
सके
हम
रही
आँख
नम
हर
समय
यार
दिल
की
न
ख़ुद
को
नज़र
में
झुका
ही
सके
हम
न
हँसते
हमें
तो
न
होता
यही
ग़म
रहा
जो
कि
सब
को
रुला
ही
सके
हम
न
थी
शोर
करने
कि
आदत
हमें
तब
न
ही
तब
किसी
आँख
आ
ही
सके
हम
गले
से
लगाया
पनस
को
वही
पर
जहाँ
आबरू
को
लुटा
ही
सके
हम
रही
यार
कोशिश
यही
हर
समय
बस
न
ख़ुद
को
दिलों
में
बिठा
ही
सके
हम
- Raunak Karn
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अल्लाह
तेरे
हाथ
है
अब
आबरू-ए-शौक़
दम
घुट
रहा
है
वक़्त
की
रफ़्तार
देख
कर
Bismil Azimabadi
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तुम्हें
लगा
है
कि
मेरे
होते,
तुम्हें
भी
दिल
में
जगह
मिलेगी
बड़ी
ही
इज़्ज़त
से
कह
रहा
हूँ
,चलो
उठो
अब
मेरी
जगह
से
Shadab Asghar
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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लड़
सको
दुनिया
से
जज़्बों
में
वो
शिद्दत
चाहिए
इश्क़
करने
के
लिए
इतनी
तो
हिम्मत
चाहिए
कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
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Nadeem Shaad
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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ऐ
"दाग़"
बुरा
मान
ना
तू
उसके
कहे
का
माशूक
की
गाली
से
तो
इज़्ज़त
नहीं
जाती
Dagh Dehlvi
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कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
Nadeem Shaad
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चादर
की
इज़्ज़त
करता
हूँ
और
पर्दे
को
मानता
हूँ
हर
पर्दा
पर्दा
नइँ
होता
इतना
मैं
भी
जानता
हूँ
Ali Zaryoun
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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दिल
में
हमारे
ग़म
ये
अब
पलता
रहेगा
मेरा
क़लम
'रौनक'
यूँँ
ही
चलता
रहेगा
Raunak Karn
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हमें
भी
ग़म
जरा
तुमको
सुनाना
था
हमें
तो
ज़ख़्म
भी
अपना
दिखाना
था
रहा
है
ख़त्म
डाटा
फोन
में
उनके
अरे
भाई
यही
उनका
बहाना
था
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Raunak Karn
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ज़मीं
भी
सूख
जाती
है
हमारे
ही
दिलों
की
यूँँ
हमें
देखे
तरस
तो
फिर
तरस
को
भी
तरस
आए
Raunak Karn
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हमें
तन्हा
अगर
अब
छोड़ने
का
यूँँ
तुझे
ग़म
जो
होता
यही
तू
जान
तेरे
आँख
का
काजल
न
यूँँ
फैला
होता
Raunak Karn
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हक़ीक़त
है
यही
रौनक
मैं
वापस
अब
न
आऊँगा
मैं
सब
सेे
दूर
काफ़ी
दूर
अब
सपने
में
जाऊँगा
करो
बदनाम
तुम
मुझको
मुझे
ताना
सुनाओ
अब
मैं
अब
गुमनाम
होकर
नाम
बस
अपना
कमाऊँगा
अगर
पैसा
न
हो
तो
लोग
सारे
छोड़
जाते
है
अरे
ये
बात
है
सच
और
सच
सबको
बताऊँगा
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Raunak Karn
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