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sahil
maine tujh ko kaha tha misre men
maine tujh ko kaha tha misre men | मैंने तुझ को कहा था मिसरे में
- sahil
मैंने
तुझ
को
कहा
था
मिसरे
में
और
वो
शे'र
हो
गया
जानाँ
- sahil
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ये
दामन
अश्क़
से
गीला
नहीं
है
अभी
दिल
से
लहू
फूटा
नहीं
है
नया
इक
दर्द
दस्तक
दे
रहा
है
पुराना
ज़ख़्म
भी
सूखा
नहीं
है
मिरी
धड़कन
तलक
पर
वो
है
क़ाबिज़
मगर
उस
में
मिरा
हिस्सा
नहीं
है
गिला
ये
है
मुझे
उस
नाख़ुदास
वो
मुझ
सा
है
मगर
मेरा
नहीं
है
यहाँ
पर
सिर्फ़
काँटे
ही
मिलेंगे
मुहब्बत
ताज
फूलों
का
नहीं
है
गुनाहों
से
अभी
वाबस्तगी
है
पुराने
पेड़
को
काटा
नहीं
है
अभी
भी
लड़
रहा
है
जंग
साहिल
दिया
तूफ़ाँ
से
ये
हारा
नहीं
है
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sahil
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फ़ुर्सत
मिले
तो
थोड़ी
मुहब्बत
भी
बाँट
लें
नफ़रत
के
बस
निशान
मिटाते
रहे
हैं
हम
sahil
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उधर
पाने
की
चाहत
है
इधर
है
लुत्फ़
खोने
का
उधर
इश्क़-ए-मजाज़ी
है
इधर
इश्क़-ए-हक़ीक़ी
है
sahil
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हादिसा
है
चराग़
बुझने
पर
रात
मातम
नहीं
मनाती
है
sahil
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ये
ऐब
है
या
है
सिफ़त
ये
मौत
का
फ़रमान
है
तुम
इश्क़
कहते
हो
जिसे
अंजान
सा
तूफ़ान
है
sahil
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