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Naresh sogarwal 'premi'
tumhein zaroor hifaazat se koii rakkhega
tumhein zaroor hifaazat se koii rakkhega | तुम्हें ज़रूर हिफ़ाज़त से कोई रक्खेगा
- Naresh sogarwal 'premi'
तुम्हें
ज़रूर
हिफ़ाज़त
से
कोई
रक्खेगा
मगर
दवा
कहाँ
से
हिज्र
की
वो
लाएगा
- Naresh sogarwal 'premi'
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हयात
से
मुझे
करिश्में
की
उमीद
थी
मैं
ख़ुद
ही
इक
अजूबा
था
करिश्मा
होता
क्या
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तुम
किसी
तरह
मिरे
क़रीब
आ
नहीं
सकी
तुमको
आने
से
मिरा
ख़याल
रोक
नइँ
सका
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कहीं
शंका
पहेली
में
बदल
जाए
कि
सोचो
इतना
ही
मक़सद
निकल
जाए
करो
काम
ऐसा
वो
दिलचस्पी
हो
जिस
में
समय
कट
जाए
और
दिल
भी
बहल
जाए
रखो
इन
आँसुओं
की
क़द्र
इतनी
सी
कि
जिसके
सामने
रोएँ
पिघल
जाए
मिरी
तन्हाई
को
हों
लफ्ज़-बा-मानी
ये
बेचैनी
सभी
ग़ज़लों
में
ढल
जाए
मुझे
अब
हौसला
इतना
दे
ऐ
मौला
जो
दिल
में
जोश
है
मंजिल
में
ढल
जाए
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मिलता
भी
नहीं
यूँँ
कोई
कहने
से
भी
हम
मिले
इस
ख़ुदा
की
साज़िशी
का
कुछ
तू
भी
ख़्याल
कर
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ख़बर
ही
नहीं
फिर
शिकायत
भी
कैसी
नहीं
मशवरा
फिर
नसीहत
भी
कैसी
नहीं
है
वो
किरदार
मेरी
कथा
का
मुहब्बत
की
हर्फ़-ओ-हिकायत
भी
कैसी
सफ़ीना
मिरा
डूबता
जा
रहा
है
कि
पतवार
राह-ए-हिदायत
भी
कैसी
खिला
फूल
ही
जब
ख़िज़ाओं
को
जाए
तो
उस
से
महक
की
मसर्रत
भी
कैसी
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