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Naresh sogarwal 'premi'
tu bhi mirii chaahat men shaamil ho gaii
tu bhi mirii chaahat men shaamil ho gaii | तू भी मिरी चाहत में शामिल हो गई
- Naresh sogarwal 'premi'
तू
भी
मिरी
चाहत
में
शामिल
हो
गई
इक
और
भी
नाक़ामी
हासिल
हो
गई
- Naresh sogarwal 'premi'
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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किसी
के
ज़ख़्म
पर
चाहत
से
पट्टी
कौन
बाँधेगा
अगर
बहनें
नहीं
होंगी
तो
राखी
कौन
बाँधेगा
Munawwar Rana
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मिरी
आरज़ू
का
हासिल
तिरे
लब
की
मुस्कुराहट
हैं
क़ुबूल
मुझ
को
सब
ग़म
तिरी
इक
ख़ुशी
के
बदले
Kashif Adeeb Makanpuri
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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मेरा
अरमान
मेरी
ख़्वाहिश
नहीं
है
ये
दुनिया
मेरी
फ़रमाइश
नहीं
है
मैं
तेरे
ख़्वाब
वापस
कर
रहा
हूँ
मेरी
आँखों
में
गुंजाइश
नहीं
है
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Abrar Kashif
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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इस
क़दर
था
खटमलों
का
चारपाई
में
हुजूम
वस्ल
का
दिल
से
मिरे
अरमान
रुख़्सत
हो
गया
Akbar Allahabadi
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हज़ारों
ख़्वाहिशें
ऐसी
कि
हर
ख़्वाहिश
पे
दम
निकले
बहुत
निकले
मिरे
अरमान
लेकिन
फिर
भी
कम
निकले
Mirza Ghalib
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तुम्हारी
याद
में
जीने
की
आरज़ू
है
अभी
कुछ
अपना
हाल
सँभालूँ
अगर
इजाज़त
हो
Jaun Elia
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बन
कर
कसक
चुभती
रही
दिल
में
मिरे
इक
आह
थी
ऐ
हम–नफ़स
मेरे
मुझे
तुझ
सेे
वफ़ा
की
चाह
थी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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मिरा
अब
नहीं
लगता
दिल
तो
कहीं
भी
हक़ीक़त
ये
मैं
हूँ
भी
और
अब
नहीं
भी
जी
ऐसे
रहा
हूँ
कि
मेरा
कोई
नइँ
मैं
घर
पहले
रहता
था
और
अब
कहीं
भी
मिरे
साथ
ख़्वाबों
की
दुनिया
है
लेकिन
हक़ीक़त
में
इक
ख़्वाब-दीदा
नहीं
भी
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Naresh sogarwal 'premi'
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इस
सेे
बेहतर
ढूँढने
की
योजना
मुझ
को
कहाँ
है
मैं
वहाँ
हूँ
अब
जहाँ
क़ुदरत
भी
रहती
बे-ज़बाँ
है
Naresh sogarwal 'premi'
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जुर्म
ये
संगीन
करता
रहता
हूँ
मैं
हर
दफ़ा
दिल
में
सहरा
रख
के
मैं
मौसम
गुलाबी
लिखता
हूँ
Naresh sogarwal 'premi'
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कभी
तो
पूछ
लीजे
हाल
मिरा
ख़ुद
को
बीमार
मैं
रखूँ
कब
तक
Naresh sogarwal 'premi'
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रहता
हूँ
आठों
पहर
तुझ
में
ही
लेकिन
मिलने
को
इक
पास
लम्हा
भी
नहीं
Naresh sogarwal 'premi'
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