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Naresh sogarwal 'premi'
KHushi aur gham ka to aalam yahii hai
KHushi aur gham ka to aalam yahii hai | ख़ुशी और ग़म का तो आलम यही है
- Naresh sogarwal 'premi'
ख़ुशी
और
ग़म
का
तो
आलम
यही
है
कि
सिगरेट
जलती
है
दोनों
समाँ
पर
- Naresh sogarwal 'premi'
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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शाम
भी
थी
धुआँ
धुआँ
हुस्न
भी
था
उदास
उदास
दिल
को
कई
कहानियाँ
याद
सी
आ
के
रह
गईं
Firaq Gorakhpuri
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छत
पे
सिगरेट
ले
के
बैठा
है
चाँद
भी
बेक़रार
है
शायद
Satya Prakash Soni
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मेरे
होंटों
पे
किसी
लम्स
की
ख़्वाहिश
है
शदीद
ऐसा
कुछ
कर
मुझे
सिगरेट
को
जलाना
न
पड़े
Umair Najmi
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नहीं
था
ध्यान
कोई
तोड़ते
हुए
सिगरेट
मैं
तुझ
को
भूल
गया
छोड़ते
हुए
सिगरेट
Afzal Khan
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तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हमको
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
Khurram Afaq
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बुरा
मनाया
था
हर
आहट
हर
सरगोशी
का
सोचो
कितना
ध्यान
रखा
उसने
ख़ामोशी
का
तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हम
को
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
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Khurram Afaq
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सिगरेट
जिसे
सुलगता
हुआ
कोई
छोड़
दे
उस
का
धुआँ
हूँ
और
परेशाँ
धुआँ
हूँ
मैं
Ameeq Hanafi
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सिगरेट
की
शक्ल
में
कभी
चाय
की
शक्ल
में
इक
प्यास
है
कि
जिसको
पिए
जा
रहे
हैं
हम
Ameer Imam
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क़सम
देता
है
बच्चों
की,
बहाने
से
बुलाता
है
धुआँ
चिमनी
का
हमको
कारख़ाने
से
बुलाता
है
Munawwar Rana
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नहीं
है
ज़ख़्मों
को
बर्दाश्त
मुझको
चैन
कहाँ
कि
मेरे
घाव
महकते
हैं
फूलों
की
जैसे
Naresh sogarwal 'premi'
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हर
ग़म
को
मैं
आयाम
दे
सकता
नहीं
ख़ुद
को
कभी
आराम
दे
सकता
नहीं
हर
इक
जुड़ा
है
रिश्ता
उसके
नाम
से
जिसको
कोई
अंजाम
दे
सकता
नहीं
मेरे
बुलाने
पर
वो
आ
जाए
मगर
ऐसा
उसे
पैग़ाम
दे
सकता
नहीं
अब
दिल
की
हालत
की
वजह
ख़ुद
ही
हैं
हम
कोई
उसे
इल्ज़ाम
दे
सकता
नहीं
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Naresh sogarwal 'premi'
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ये
हमारी
ख़स्ता
हालत
रात
की
है
और
ये
बैचेनी
बस
जज़्बात
की
है
कहने
को
तो
हम
झलक
नइँ
भूल
पाते
तुमको
तो
देखा
है
तुम
सेे
बात
की
है
तुमको
भूलें
भी
तो
कैसे
भूलें
जानाँ
तुमने
तो
हम
सेे
बहुत
कम
बात
की
है
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Naresh sogarwal 'premi'
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वही
जनवरी
वही
फरवरी
वही
सोमवार
वही
शुक्रवार
नया
साल
आ
गया
ले
के
फिर
वही
ज़ाबता
वही
दास्तान
Naresh sogarwal 'premi'
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बिछड़ने
वाले
में
उल्फ़त
अलावा
कुछ
भी
नइँ
था
पर
वफ़ाओं
से
कहाँ
चाहत
मुकम्मल
होती
है
ऐ
दोस्त
Naresh sogarwal 'premi'
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