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Naresh sogarwal 'premi'
kab se tum kah rahi ho ki fursat nahin
kab se tum kah rahi ho ki fursat nahin | कब से तुम कह रही हो कि फ़ुर्सत नहीं
- Naresh sogarwal 'premi'
कब
से
तुम
कह
रही
हो
कि
फ़ुर्सत
नहीं
कहती
ये
क्यूँ
नहीं
मेरी
जुरअत
नहीं
अब
ये
कहने
में
कितने
लगेंगे
दिन
और
अब
मुझे
तुम
सेे
कोई
मुहब्बत
नहीं
- Naresh sogarwal 'premi'
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मेरे
दुख
ग़म-ज़दा
हो
गए
क्या
थे
हम
और
क्या
हो
गए
दिल
में
बस
रह
गए
ये
ख़याल
ख़्वाब
सारे
अदा
हो
गए
और
इस
सेे
बुरा
होगा
क्या
हम
कि
तुम
से
जुदा
हो
गए
आसमाँ
से
गिरी
थी
ये
बर्क़
मेरे
ही
घर
धुआँ
हो
गए
मैं
कभी
जिनसे
झगड़ा
नहीं
यार
वो
भी
ख़फ़ा
हो
गए
प्यार
भरपूर
कर
नइँ
सके
लोग
वो
भी
ख़ुदा
हो
गए
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दिल
है
कि
हर
पल
रहता
है
लबरेज़
ग़म
से
मिरा
गो
अब
तो
हर
इक
शे'र
मुझको
याद
रह
जाता
है
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ये
ज़रा
बता
दो
तुम
यूँँ
बिछड़ने
से
पहले
क्या
करें
वो
जो
तुमको
भूल
भी
नहीं
सकते
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ग़म
ही
मुझको
कहीं
ये
खा
जाए
बिन
मुहब्बत
के
मौत
आ
जाए
चेहरा
अपना
मुझे
दिखा
जाए
दूर
से
हाथ
ही
हिला
जाए
जाँ
से
हालत
है
मेरी
ना-वाक़िफ़
आज
मुझको
कोई
रुला
जाए
कैसे
हो
आप
पूछकर
मुझ
से
ख़ुदस
ही
मझको
वो
मिला
जाए
बालों
में
हाथ
फेर
के
निंदिया
थपकियों
से
मुझे
सुला
जाए
भर
के
ग़म
बे-निशान
ज़ख़्मों
में
इस
सुकूँ
की
ख़ुशी
मिटा
जाए
वो
कभी
जिस
से
मैं
मिला
नहीं
और
इक
दफ़ा
छोड़
के
चला
जाए
रूह
में
मेरी
रहता
जो
हर-दम
मुझ
से
वो
हाथ
तो
लगा
जाए
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इस
सेे
बेहतर
ढूँढने
की
योजना
मुझ
को
कहाँ
है
मैं
वहाँ
हूँ
अब
जहाँ
क़ुदरत
भी
रहती
बे-ज़बाँ
है
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