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Naresh sogarwal 'premi'
Zindagi ke sabhi kirdar farishte ho gye
ज़िंदगी के सभी किरदार फ़रिश्ते हो गए
- Naresh sogarwal 'premi'
ज़िंदगी
के
सभी
किरदार
फ़रिश्ते
हो
गए
यानी
सारे
ही
मिरे
यार
फ़रिश्ते
हो
गए
मुख़्तसर
ही
रहा
अम्बार
मिरे
रिश्तों
का
क़िस्सा
वा
हो
गया
किरदार
फ़रिश्ते
हो
गए
दास्ताँ
एक
पहेली
हो
गई
बन
के
मिरी
ज़ख़्म
ख़ूँ
हो
गए
उपचार
फ़रिश्ते
हो
गए
इल्तिजा
क्या
रखूँ
तुझ
सेे
ये
सुकून-ए-हस्ती
बख़्शा
था
चैन
वो
आसार
फ़रिश्ते
हो
गए
- Naresh sogarwal 'premi'
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ग़म
ही
मुझको
कहीं
ये
खा
जाए
बिन
मुहब्बत
के
मौत
आ
जाए
चेहरा
अपना
मुझे
दिखा
जाए
दूर
से
हाथ
ही
हिला
जाए
जाँ
से
हालत
है
मेरी
ना-वाक़िफ़
आज
मुझको
कोई
रुला
जाए
कैसे
हो
आप
पूछकर
मुझ
से
ख़ुदस
ही
मझको
वो
मिला
जाए
बालों
में
हाथ
फेर
के
निंदिया
थपकियों
से
मुझे
सुला
जाए
भर
के
ग़म
बे-निशान
ज़ख़्मों
में
इस
सुकूँ
की
ख़ुशी
मिटा
जाए
वो
कभी
जिस
से
मैं
मिला
नहीं
और
इक
दफ़ा
छोड़
के
चला
जाए
रूह
में
मेरी
रहता
जो
हर-दम
मुझ
से
वो
हाथ
तो
लगा
जाए
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उसकी
याद
हमको
और
भी
सताने
वाली
है
जून
का
महीना
है
वसंत
आने
वाली
है
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वस्ल
तेरा
मुख़्तसर
तिरा
फ़िराक़
उम्र
भर
जान
तुझको
भूलें
और
तुझको
याद
भी
करें
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सभी
को
हक़
है
अपनी
अपनी
ज़िंदगी
सुधार
का
प
इश्क़
में
तो
मेरी
जान
शर्त
रखना
पाप
है
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सौ
शिकायतें
हैं
तुम
सेे
इक
का
भी
गिला
नहीं
हो
के
रह
गया
है
कुछ
जिसे
असर
हुआ
नहीं
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