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Naresh sogarwal 'premi'
dekhooñ jaañ be-dili be-dili hai
dekhooñ jaañ be-dili be-dili hai | देखूँ जाँ बे-दिली बे-दिली है
- Naresh sogarwal 'premi'
देखूँ
जाँ
बे-दिली
बे-दिली
है
मेरी
अब
तो
यही
ज़िन्दगी
है
जिस
मकाँ
रहते
जम
जाए
जो
धूल
ला-मकाँ
स्त्री
की
कमी
है
आज
फिर
ग़म
नहीं
खुल
भी
पाया
आज
फिर
इक
नई
बेबसी
है
दिल
नई
याद
में
जाता
है
डूब
रोज़
फिर
इक
नई
सी
कमी
है
जुज़
जिसे
कर
नहीं
पाया
कामिल
ये
नज़र
जाँ
थी
वाँ
ही
थमी
है
आह
गोशा-ए-तन्हाई
में
भी
बे-सर-ओ-पा
के
ये
बेख़ुदी
है
नाला
होने
को
कब
से
हूँ
आतुर
अश्क-ए-ग़म
मुझ
सेे
क्यूँँ
बरहमी
है
- Naresh sogarwal 'premi'
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उसकी
याद
हमको
और
भी
सताने
वाली
है
जून
का
महीना
है
वसंत
आने
वाली
है
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तू
होती
तो
हम
इतने
यूँँ
बेज़ार
न
होते
हम
ऐसे
मुहब्बत
में
भी
बीमार
न
होते
मुझको
न
ज़रूरत
किसी
हमदर्द
की
होती
गर
हम
यूँँ
ग़म-ए-इश्क़
में
सरशार
न
होते
ये
लोग
मुझे
देख
के
मुस्काते
अगरचे
हम
इतना
उदासी
से
सरोकार
न
होते
मुझ
सेे
भी
बशर
लेते
मुहब्बत
की
मिसालें
तक़दीर
के
हम
इतने
जो
बेकार
न
होते
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करती
है
दु'आ
कि
आप
मुझको
भूल
जाएँ
अब
कहती
थी
जो
हर
जगह
तुम्ही
दिखाई
देते
हो
Naresh sogarwal 'premi'
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सब
सेे
अब
दूर
हो
गया
हूँ
मैं
बड़ा
मजबूर
हो
गया
हूँ
मैं
कोई
रुकता
नहीं
है
मुझ
में
अब
यानी
दस्तूर
हो
गया
हूँ
मैं
कर
जो
देता
हूँ
हर
ख़ुशी
को
उदास
यानी
रंजूर
हो
गया
हूँ
मैं
जल
रहा
हूँ
मैं
एक
मुद्दत
से
कितना
बेनूर
हो
गया
हूँ
मैं
दे
रही
है
तसल्ली
तन्हाई
ख़ुद
को
मंज़ूर
हो
गया
हूँ
मैं
होश
खोता
नहीं
मिरा
अब
तो
आब-ए-अंगूर
हो
गया
हूँ
मैं
बन
गई
बेबसी
मिरी
मिन्नत
कितना
माज़ूर
हो
गया
हूँ
मैं
अब
न
करना
दवा
की
तू
तरतीब
ज़ख़्म
नासूर
हो
गया
हूँ
मैं
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कभी
तो
पूछ
लीजे
हाल
मिरा
ख़ुद
को
बीमार
मैं
रखूँ
कब
तक
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