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Prashant Sitapuri
main rad
main rad | मैं रद्दी के पुराने ढेर में ज़ाया' न हो जाऊँ
- Prashant Sitapuri
मैं
रद्दी
के
पुराने
ढेर
में
ज़ाया'
न
हो
जाऊँ
किताबों
की
तरह
मुझको
कोई
पढ़
ले
तो
अच्छा
है
- Prashant Sitapuri
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प्रेम
की
गली
में
सब
शराब
लेकर
आए
थे
हम
बहुत
ख़राब
थे
किताब
लेकर
आए
थे
Aman Akshar
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इक
और
किताब
ख़त्म
की
फिर
उस
को
फाड़
कर
काग़ज़
का
इक
जहाज़
बनाया
ख़ुशी
हुई
Ameer Imam
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अगर
फ़ुर्सत
मिले
पानी
की
तहरीरों
को
पढ़
लेना
हर
इक
दरिया
हज़ारों
साल
का
अफ़्साना
लिखता
है
Bashir Badr
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एक
आवाज़
पे
आ
जाती
है
दौड़ी
दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान
नहीं
देखती
है
दोस्ती
दोस्ती
होती
है
तुम्हें
इल्म
नहीं
दोस्ती
फ़ाइदा
नुक़सान
नहीं
देखती
है
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Aadil Rasheed
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उतारा
दिल
के
वरक़
पर
तो
कितना
पछताया
वो
इंतिसाब
जो
पहले
बस
इक
किताब
पे
था
Aanis Moin
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चुपके
चुपके
वो
पढ़
रहा
है
मुझे
धीरे
धीरे
बदल
रहा
हूँ
मैं
Aziz Nabeel
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हमें
पढ़ाओ
न
रिश्तों
की
कोई
और
किताब
पढ़ी
है
बाप
के
चेहरे
की
झुर्रियाँ
हम
ने
Meraj Faizabadi
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आदमिय्यत
और
शय
है
इल्म
है
कुछ
और
शय
कितना
तोते
को
पढ़ाया
पर
वो
हैवाँ
ही
रहा
Sheikh Ibrahim Zauq
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लिक्खा
गया
न
कुछ
कभी
मुझ
सेे
जवाब
में
रक्खा
ही
रह
गया
है
तेरा
ख़त
किताब
में
Ankit Maurya
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'आशिक़
का
ख़त
है
पढ़ना
ज़रा
देख-भाल
के
काग़ज़
पे
रख
दिया
है
कलेजा
निकाल
के
LALA RAKHA RAM BARQ
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अभी
मुमकिन
है
मुझको
रोक
ले
तू
अभी
सीधा
है
रस्ता
वापसी
का
Prashant Sitapuri
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पूछा
था
किसी
ने
के
पंखे
से
लटकना
है
मैंने
ये
बताया
था
के
ऐसे
लटकते
हैं
Prashant Sitapuri
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ग़मज़दा
इस
ज़िन्दगी
को
देखते
हैं
और
फिर
अपनी
घड़ी
को
देखते
हैं
ये
सुकूँ
मानो
कि
मर
के
चैन
से
हम
जी
रहे
हर
आदमी
को
देखते
हैं
आप
क्या
क्या
देखते
हैं
आप
जानें
हम
मगर
सादा-दिली
को
देखते
हैं
कुछ
कहूँ
हाँ
यार
अच्छा
ये
बताना
कब
से
मुझ
में
रफ़्तगी
को
देखते
हैं?
आप
भी
सबकी
तरह
हैं
'ऐब-बीनी
आप
भी
मेरी
कमी
को
देखते
हैं
प्यार
क्या
है?,
आप
बस
इतना
समझिये
राम
अपनी
जानकी
को
देखते
हैं
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Prashant Sitapuri
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फ़रेबी,
झूठ
कहती
जा
रही
है
मुझे
क्या
क्या
समझती
जा
रही
है
ये
सोंचा
था
पकड़
ली
रेत
मैंने
मगर
ये
तो
फिसलती
जा
रही
है
बचा
लो
यार
इस
दरियादिली
को
निगाहों
से
उतरती
जा
रही
है
भरोसा
क्या
करूँँ
मैं
ज़िन्दगी
का
ये
तो
बातें
बदलती
जा
रही
है
ज़हर
कैसा
हवा
में
घुल
गया
ये
मेरी
तबियत
बिगड़ती
जा
रही
है
तुम्हारे
बाद
मैं
भी
क्या
करूँँगा
सो
ये
अब
उम्र
ढलती
जा
रही
है
मेरे
हाँथो
में
छाले
पड़
गए
हैं
मगर
किस्मत
बदलती
जा
रही
है
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Prashant Sitapuri
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अगर
मौका
मिला
तो
एक
दिन
अख़बार
देखेंगे
सियाही
में
है
कितनी
झूठ
की
मिक़दार,
देखेंगे
Prashant Sitapuri
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