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Prashant Beybaar
insaaniyat kii jab bhi kabhi justajoo karo
insaaniyat kii jab bhi kabhi justajoo karo | इंसानियत की जब भी कभी जुस्तजू करो
- Prashant Beybaar
इंसानियत
की
जब
भी
कभी
जुस्तजू
करो
तो
दीन
की
गली
से
किनारा
शुरू
करो
महँगाई
में
किफ़ायती
है
शौक़
ये
बड़ा
बैठे
बिठाए
कोई
नई
आरज़ू
करो
नुस्ख़ा
ये
ख़ुद-कुशी
का
बड़ा
कार-गर
मियाँ
जो
भी
कहे
ज़माना
वही
हू-ब-हू
करो
- Prashant Beybaar
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दर्द,
आँसू,
बे-क़रारी,
हिज्र,
यादें,
बेख़ुदी
कौन
कहता
है
मोहब्बत
में
मिला
कुछ
भी
नहीं
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बेकार
मेरा
ग़ुस्सा
कुछ
काम
का
नहीं
है
बाहों
में
भर
ले
गर
वो
सब
भूल
जाता
हूँ
मैं
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रात
काली
है
तो
क्या
है
चाँद
की
ही
बद-दुआ
है
इश्क़
ये
कब
था
सुकूँ
जो
इश्क़
अब
बेदिल
सज़ा
है
तुम
अकेले
हो
मगर
वो
भीड़
में
तन्हा
हुआ
है
मेरे
दिल
के
जैसा
ही
है
टूटा
फूटा
घर
बना
है
जुर्म
दिल
के
माफ़
हैं
सब
बस
तवक़्क़ो
ही
मना
है
पूछो
कुछ
बेबार
उस
सेे
झूठा
है
लेकिन
ख़ुदा
है
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Prashant Beybaar
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मरेंगे
तो
यहीं
सामान
छोड़
जाएँगे
कुछ
एक
ग़ज़लों
का
दीवान
छोड़
जाएँगे
मिलेंगे
मौत
को
इस
तरह
पूरी
शिद्दत
से
कि
ज़िन्दगी
को
भी
हैरान
छोड़
जाएँगे
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Prashant Beybaar
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साहबे-सख़ा
हो
तुम,
ये
भी
रहम
अता
करो
मुश्किलों
का
दौर
है,
दु'आ
करो
दु'आ
करो
मौत
की
जकड़
से
साँस
लौट
आयेगी
भला
तुम
ख़ुदा
का
रूप
हो,
रज़ा
करो
रज़ा
करो
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