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Prashant Prakhar
kitnii dafa kahooñ vo kahaanii merius par bhi har dafa main zabaani meri
kitnii dafa kahooñ vo kahaanii merius par bhi har dafa main zabaani meri | कितनी दफ़ा कहूँ वो कहानी मेरी
- Prashant Prakhar
कितनी
दफ़ा
कहूँ
वो
कहानी
मेरी
उस
पर
भी
हर
दफ़ा
मैं
ज़बानी
मेरी
उसे
बनाने
वाले
हाथ
मैं
चूमूँ
ये
थी
ख़्वाहिश
एक
पुरानी
मेरी
उसकी
गलियों
में
जब
उठा
जनाज़ा
मुझको
आई
याद
जवानी
मेरी
इन
फ़ुर्क़त
के
लम्हों
में
मरहम
हैं
जो
यादें
हैं
चंद
निशानी
मेरी
क्या
दुनिया
में
कोई
ऐसी
भी
है
रह
ले
जो
ता-उम्र
दिवानी
मेरी
- Prashant Prakhar
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हम
कहाँ
थे
रूबरू
ढलती
हुई
इस
उम्र
से
हम
न
जाने
छोड़
आए
ज़िंदगी
किस
राह
में
Prashant Prakhar
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देखिए
तो
भुखमरी
ये
और
गंदी
बस्तियाँ
भी
देश
की
हालत
वही
आईं
गईं
सरकार
कितनी
Prashant Prakhar
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दिल
के
कोने-कोने
में
बे-ताबी
है
शायद
उनके
ख़्वाबों
में
हमराही
है
दस्तक
दो
चाहे
लाख
मिन्नतें
कर
लो
रूह
जिसे
सुन
सकती
है
ख़ामोशी
है
तकिए
के
नीचे
उसका
ख़त
सोया
है
मेरे
बाजू
में
सोई
बेचैनी
है
देखो
थककर
लौट
रहा
है
दफ़्तर
से
उसकी
हल्की
जेबों
में
मायूसी
है
इन
बेगानी
राहों
पर
चलते
जाना
आवारा-गर्दी
भी
इक
फ़नकारी
है
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Prashant Prakhar
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यह
कोई
न
जाने
कैसे
होगा
कब
होगा
जिस
रोज़
ख़ुदा
की
मर्ज़ी
होगी
तब
होगा
सपने
टूटे
अरमाँ
बिखरे
रोना
कैसा
जब
वक़्त
मुवाफ़िक़
तेरे
होगा
सब
होगा
दिल
ने
उसकी
यादों
की
बज़्म
सजाई
है
लगता
है
आज
तमाशा
पूरी
शब
होगा
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Prashant Prakhar
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जतन
भी
देखे
शिकस्तगी
भी
सुकून
पाया
ज़फ़र
जो
देखा
नए
परिंदों
के
पंख
देखे
हुआ
अचंभा
हुनर
जो
देखा
Prashant Prakhar
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