अहल-ए-ज़ौक़-ए-शाइरी दो-चार यकजा बैठते हैं

  - Milan Gautam
अहल-ए-ज़ौक़-ए-शाइरीदो-चारयकजाबैठतेहैं
महफ़िलेंतबबनतीहैंजबयारयकजाबैठतेहैं
हुक्मयेहीथाकिइक-दूजेसेहट-करबैठनाहै
फिरभीहमदोनोंहैंजोहरबारयकजाबैठतेहैं
जैसाभीहोदर्दअकेलेसहनापड़ताहैयहाँपर
येकभीमतसोचनाग़म-ख़्वारयकजाबैठतेहैं
आँखोंसेहीकरतीहैबे-ख़ुदवोसाक़ीसेनहींकम
वोजहाँभीबैठतीमय-ख़्वारयकजाबैठतेहैं
आए-दिनहोनेलगीहैंबहसेंउसकेहुस्नपरअब
जा-ब-जाउसकेहीदावेदारयकजाबैठतेहैं
बसग़ज़ल-गोईवहीहोतीहैयाँमशहूरजिस
में
फ़र्त-ए-एहसासातऔरअश'आरयकजाबैठतेहैं
  - Milan Gautam
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