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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
yahaañ se door ik duniya banata hai
yahaañ se door ik duniya banata hai | यहाँ से दूर इक दुनिया बनाता है
- Nikhil Tiwari 'Nazeel'
यहाँ
से
दूर
इक
दुनिया
बनाता
है
जहाँ
पानी
ही
पानी
को
डुबाता
है
चमकता
शम्स
तक
हासिल
नहीं
उसको
बदन
की
रौशनी
है
दिल
जलाता
है
- Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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जब
कभी
तैश
में
कमी
आई
हर
क़सम
फिर
क़सम
रही
आई
रहरव-ए-शौक़
जिस
तरफ़
निकले
मौत
बस
रू-ब-रू
चली
आई
मसअला
तुम
पता
करो
जा
कर
आज
क्यूँँ
आग
में
नमी
आई
सात
ग़म
पास
रख
लिए
गिन
के
ज़िंदगी
याद
ही
नहीं
आई
पूछ
मत
यार
तू
अभी
हम
से
आख़िरी
बार
कब
हँसी
आई
लफ़्ज़
मेरे
लहू
लुहान
हुए
और
आवाज़
भी
दबी
आई
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फिर
रोज़
की
तरह
का
वही
ग़म
समेटना
ऊपर
से
इस
शराब
से
उक्ता
गया
था
मैं
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जहाँ
तक
दरख़्शाँ
उछाले
गए
वहीं
तक
ही
उनके
उजाले
गए
हमीं
ने
क़बाहत
उठाई
थी
जब
फ़लक
को
ज़मीं
के
इज़ाले
गए
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जब
क़िस्मत
का
अच्छा
होना
होता
है
पत्थर
छू
लेने
से
सोना
होता
है
खप
जाता
है
जीवन
कुछ-कुछ
पाने
में
फिर
आख़िर
में
सब
कुछ
खोना
होता
है
आधे
तो
हम
बँट
जाते
हैं
महफ़िल
में
आधा
पैकर
ख़ुद
को
ढोना
होता
है
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हादसे
इक
रात
गिनती
में
उठे
और
सब
इक
साथ
गिनती
में
उठे
या
कि
मैं
ख़ामोश
हो
जाऊँ
यहाँ
या
मिरी
हर
बात
गिनती
में
उठे
देख
मेरी
हल्फ़-बरदारी,
ख़ुदा
देख
सारे
हाथ
गिनती
में
उठे
ज़िंदगी
शतरंज
की
बाज़ी
चले
और
शह
या
मात
गिनती
में
उठे
बर्क़-अफ़्गन
बन
चुका
वो
आसमाँ
काश
सौ
बरसात
गिनती
में
उठे
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