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Navneet Vatsal Sahil
aakhiri sar
aakhiri sar | "आख़िरी सर्दी"
- Navneet Vatsal Sahil
"आख़िरी
सर्दी"
सब
तबाह-ओ-बर्बाद
हो
जाएगा
ये
सितम
है
कि
इक
दिन
कोई
तुम
पर
मरते-मरते
मर
जाएगा
तुम
से
था
वो
जो
सुरख़ाब
चेहरा
कि
जिस
पे
तुम
मरती
थीं
बेनूर
हो
जाएगा
मेंरे
चश्मों
को
बीनाई
जो
तुमने
की
थी
अता
उसको
देखना
नमी
लग
जाएगी
ज़ंग
खा
जाएगा
एक
दिल
जिसको
बरसों
धड़काया
तुम
ने
बेचैन-ओ-बेक़रार
रखा
वो
भी
जान
क़रार
पा
जाएगा
साँसें
जो
महकती
रहीं
हैं
अभी
तलक
सो
उनको
भी
सीने
का
एक
ज़ख़्म
खा
जाएगा
जिस
जिस्म
को
गर्मी-ए-आग़ोश
में
कितनी
सर्दियां
तुम
ने
रखा
था
इस
सर्दी
शायद
सर्द
हो
जाएगा
असर
खो
जाएगा
और
आख़िरश
एक
लड़का
जिस
से
तुम
को
निस्बत
थी
जिस
को
तुम
से
निस्बत
है
हिज़्र
तुम्हारा
खा
जाएगा
मर
जाएगा
एक
लड़का
बिछड़
कर
तुम
सेे
इस
सर्दी
सुनो
मुझको
ऐसा
लगता
है
मर
जाएगा
- Navneet Vatsal Sahil
हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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हिज्र
में
तुमने
केवल
बाल
बिगाड़े
हैं
हमने
जाने
कितने
साल
बिगाड़े
हैं
Anand Raj Singh
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सुकून
देती
थी
तब
मुझको
वस्ल
की
सिगरेट
अब
उसके
हिज्र
के
फ़िल्टर
से
होंठ
जलते
हैं
Upendra Bajpai
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उस
सेे
तो
मैं
बिछड़
गया
अब
देख
ऐ
'पवन'
कब
दुनिया
आए
रास
यही
सोचता
रहा
Pawan Kumar
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियाँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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काट
पाऊँगा
मैं
कैसे
ज़िंदगी
तेरे
बग़ैर
तीन
दिन
का
हिज्र
मुझ
को
लग
रहा
है
तीन
साल
Afzal Ali Afzal
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तू
परिंदा
है
किसी
शाख़
को
घर
कर
लेगा
जो
तेरे
हिज्र
का
मारा
है
किधर
जाएगा
Shadab Javed
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इस
दिल
को
गोकुल
धाम
किए
है
इक
राधा
मुझ
को
श्याम
किए
है
Navneet Vatsal Sahil
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बस
इक
तेरे
होने
से
घर
बनता
है
कहने
को
तो
सबकी
हिस्सेदारी
है
Navneet Vatsal Sahil
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होंठों
पर
ख़ामोशी
रखने
वालों
की
इन
आँखों
में
ग़म
का
दरिया
पलता
है
Navneet Vatsal Sahil
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कितना
सन्नाटा
होगा
उसके
भीतर
मैंने
हरदम
हँसता
देखा
है
उस
को
Navneet Vatsal Sahil
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तुझ
को
देखना
हम-आग़ोश
न
कर
लें
वो
तू
यूँँ
न
जी
शीशों
का
ललचाया
कर
Navneet Vatsal Sahil
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