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Muneer shehryaar
jis se milta tha khule dil se main bachpan ki tarah
jis se milta tha khule dil se main bachpan ki tarah | जिस से मिलता था खुले दिल से मैं बचपन की तरह
- Muneer shehryaar
जिस
से
मिलता
था
खुले
दिल
से
मैं
बचपन
की
तरह
देखता
वो
है
मुझे
आज
भी
दुश्मन
की
तरह
शर्म
को
ताक
पे
रक्खा
है
यहाँँ
लोगों
ने
ये
मेरा
शहर
भी
हो
जाएगा
लंदन
की
तरह
उसके
ऊपर
तो
मुझे
कोई
भरोसा
ही
नहीं
दोस्त
मेरा
तो
बदल
जाता
है
सीजन
की
तरह
ऐसा
लगता
है
वो
पहने
है
कलाई
में
मुझे
वो
घुमाती
है
मुझे
रोज़
ही
कंगन
की
तरह
- Muneer shehryaar
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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इतनी
शोहरत
तो
मेरी
आज
भी
इस
शहर
में
है
एक
पत्ता
न
हिले
मेरी
इजाज़त
के
बग़ैर
Mukesh Jha
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हैं
बाशिंदे
उसी
बस्ती
के
हम
भी
सो
ख़ुद
पर
भी
भरोसा
क्यूँ
करें
हम
Jaun Elia
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कहाँ
तो
तय
था
चराग़ाँ
हर
एक
घर
के
लिए
कहाँ
चराग़
मुयस्सर
नहीं
शहर
के
लिए
Dushyant Kumar
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बस्ती
में
अपनी
हिन्दू
मुसलमाँ
जो
बस
गए
इंसाँ
की
शक्ल
देखने
को
हम
तरस
गए
Kaifi Azmi
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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यूँँ
ही
नहीं
बस्ती
जली,
यूँँ
ही
नहीं
सब
लड़
मरे
कुछ
लोग
आए
बाहरी,
फिर
मज़हबी
दंगा
हुआ
Ankit Raj
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अनोखी
वज़्अ
है
सारे
ज़माने
से
निराले
हैं
ये
'आशिक़
कौन
सी
बस्ती
के
या-रब
रहने
वाले
हैं
Allama Iqbal
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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मुझे
तुम
याद
आओगी
तो
तुमको
याद
कर
लूंँगा
तुम्हारी
याद
से
ही
मैं
कोई
फ़रियाद
कर
लूंँगा
Muneer shehryaar
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वो
कल
मिली
थी
हमको
जो
रस्ते
में
बे
नक़ाब
हमने
नज़र
झुका
ली
तो
अच्छा
लगा
उसे
Muneer shehryaar
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नींद
बच्चों
को
यूँँ
भी
तो
आती
रही
नानी
उनकी
कहानी
सुनाती
रही
वो
जो
लड़की
ज़माने
में
मासूम
थी
उसको
पागल
यह
दुनिया
बनाती
रही
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Muneer shehryaar
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सब
से
ता'रीफ़
मेरी
मत
करना
सुनके
कुछ
लोग
मर
ही
जाएँगे
Muneer shehryaar
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यही
कह
के
उसका
तो
चेहरा
खिला
है
ज़माने
में
कोई
न
तुम
सेा
मिला
है
मैं
उनका
रहूँँगा
कोई
उन
सेे
कह
दे
न
कोई
शिकायत
न
कोई
गिला
है
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Muneer shehryaar
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