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Mohit Negi Muntazir
jin ke zulmon ko ham sah ga.e
jin ke zulmon ko ham sah ga.e | जिन के ज़ुल्मों को हम सह गए
- Mohit Negi Muntazir
जिन
के
ज़ुल्मों
को
हम
सह
गए
वो
हमें
बे-वफ़ा
कह
गए
ख़्वाब
वो
मिल
के
देखे
हुए
आँसुओं
में
सभी
बह
गए
तुम
न
आए
नज़र
दूर
तक
राह
हम
देखते
रह
गए
रो
पड़ा
गाँव
में
जा
के
मैं
मेरे
पुश्तैनी
घर
ढह
गए
ज़िंदगी
के
हर
इक
मोड़
पर
ज़ख़्म
जलते
हुए
रह
गए
'मुंतज़िर'
ढाल
कर
शे'र
में
अपनी
बातों
को
क्यूँ
कह
गए
- Mohit Negi Muntazir
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जब
हमें
तुम
याद
आए
रात
भर
आँसुओं
ने
ग़म
बहाए
रात
भर
ख़्वाब
कितने
ही
सजाए
रात
भर
जिन
को
चाहा
वो
न
आए
रात
भर
एक
सूरज
ढल
गया
जब
शाम
को
चाँद
तारे
मुस्कुराए
रात
भर
कल
मुझे
इक
फूल
पन्नों
में
मिला
दिन
पुराने
याद
आए
रात
भर
जिन
के
प्रीतम
दूर
थे
परदेस
में
चाँदनी
ने
दिल
जलाए
रात
भर
कहते
हैं
जो
क़िस्मतों
का
खेल
है
ख़्वाब
उन
को
क्यूँ
जगाए
रात
भर
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Mohit Negi Muntazir
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