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Mohit Subran
jab utre ashk mujhe bheed se utarna pada
jab utre ashk mujhe bheed se utarna pada | जब उतरे अश्क मुझे भीड़ से उतरना पड़ा
- Mohit Subran
जब
उतरे
अश्क
मुझे
भीड़
से
उतरना
पड़ा
कि
एक
कर्ब
छुपाने
को
क्या
न
करना
पड़ा
- Mohit Subran
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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अश्कों
को
आरज़ू-ए-रिहाई
है
रोइए
आँखों
की
अब
इसी
में
भलाई
है
रोइए
Abbas Qamar
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मैं
इस
ख़याल
से
जाते
हुए
उसे
न
मिला
कि
रोक
लें
न
कहीं
सामने
खड़े
आँसू
Jawwad Sheikh
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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मेरे
आँसू
नहीं
थम
रहे
कि
वो
मुझ
सेे
जुदा
हो
गया
और
तुम
कह
रहे
हो
कि
छोड़ो
अब
ऐसा
भी
क्या
हो
गया
मय-कदों
में
मेरी
लाइनें
पढ़ते
फिरते
हैं
लोग
मैंने
जो
कुछ
भी
पी
कर
कहा
फ़लसफ़ा
हो
गया
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Tehzeeb Hafi
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गर्म
आँसू
और
ठंडी
आहें
मन
में
क्या
क्या
मौसम
हैं
इस
बग़िया
के
भेद
न
खोलो
सैर
करो
ख़ामोश
रहो
Ibn E Insha
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मैं
इस
लिए
भी
तेरे
फ़न
की
क़द्र
करता
हूँ
तू
झूठ
बोल
के
आँसू
निकाल
लेता
है
Ahmad Kamal Parvazi
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आँसू
आँसू
जिस
ने
दरिया
पार
किए
क़तरा
क़तरा
आब
में
उलझा
बैठा
है
Mashkoor Husain Yaad
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इस
बार
अश्क
कर
चुके
क़ीमत
अदायगी
इस
बार
तेरा
जाना
भी
ज़ाया'
नहीं
लगा
Aqib khan
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हाँ
मेरे
साथ
कई
नफ़्सियाती
मसअले
हैं
तमाम
ज़हनी
मसाइल
से
जूझता
हूँ
मैं
ये
ज़ेहन
मेरा
न
मुझ
को
कहीं
निगल
बैठे
मुझे
बचाओ
रफ़ीक़ो
कि
डूबता
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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बात
जब
हक़
की
हो
इक
शख़्स
नहीं
आता
है
बात
मज़हब
की
हो
तो
भीड़
निकल
आती
है
Mohit Subran
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पगड़ियों
तक
को
नहीं
छोड़ा
भला
सर
पे
हमारे
आँधियाँ
सब
कुछ
उड़ा
कर
ले
गईं
घर
से
हमारे
Mohit Subran
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बह्र
का
इल्म
मात्रा
का
ज्ञान
शे'र
कहना
भी
है
गणित
जैसा
Mohit Subran
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फैलते
ही
ज़द
में
ले
लेती
है
सब
को
आग
कब
हिन्दू-मुसलमाँ
देखती
है
Mohit Subran
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