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Ammar 'yasir'
samajh aaya ye falsafa ab mujhe
samajh aaya ye falsafa ab mujhe | समझ आया ये फ़लसफ़ा अब मुझे
- Ammar 'yasir'
समझ
आया
ये
फ़लसफ़ा
अब
मुझे
नहीं
जुड़ता
कुछ
टूट
जाने
के
बाद
- Ammar 'yasir'
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माँ
तुझ
को
बताता
तो
नहीं
हूँ
पर
तुझ
को
पता
है
ना
मेरा
प्यार
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मुझ
को
पहचान
मेरे
लहजे
से
देख
मत
मुझ
को
इस
रवय्ये
से
मैंने
सिगरेट
थाम
कर
फेंकी
बच
गया
है
ये
हाथ
जलने
से
दूर
जाने
का
डर
सता
रहा
है
तेरे
इतने
क़रीब
होने
से
ऐसी
स्याही
से
है
लिखा
ये
नाम
अब
कि
मिटता
नहीं
मिटाने
से
मुझ
को
आदत
है
तन्हा
रहने
की
ख़ुश
हूँ
मैं
तेरे
छोड़
जाने
से
मैं
भी
पहले
ये
सोचता
था
कभी
कौन
मरता
है
प्यार
करने
से
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तेरी
आँखों
में
मैं
खोना
चाहता
हूँ
मैं
तेरा
ही
अब
से
होना
चाहता
हूँ
तू
मुझे
अब
पास
तो
अपने
बुला
ले
मैं
तेरी
बाँहों
में
सोना
चाहता
हूँ
मैं
हँसा
इतना
जो
सबके
सामने
सो
अब
अकेले
थोड़ा
रोना
चाहता
हूँ
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एक
ज़ख़्म
जिसकी
अब
दु'आ
नहीं
तेरे
जैसा
कोई
भी
मिला
नहीं
दूरियों
के
बावजूद
ख़ुश
हूँ
मैं
अब
किसी
से
कोई
भी
गिला
नहीं
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Ammar 'yasir'
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मुझ
को
अब
वो
फ़ना
कर
गया
है
मुझ
को
मुझ
से
जुदा
कर
गया
है
हो
गया
और
किसी
का
वो
लेकिन
मुझ
को
अपना
बना
कर
गया
है
मैं
अभी
भी
हूँ
ग़ाएब
कहीं
पर
यूँँ
वो
मुझ
पर
नशा
कर
गया
है
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