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Manish Yadav
fansoonga ab zaroor uske fansaane men
fansoonga ab zaroor uske fansaane men | फॅंसूँगा अब ज़रूर उसके फॅंसाने में
- Manish Yadav
फॅंसूँगा
अब
ज़रूर
उसके
फॅंसाने
में
बिठाये
उसने
साँप
अब
खाने
खाने
में
उसे
गुमराह
कर
दूँगा
मुहब्बत
में
कभी
आ
जाए
वो
मेरे
बहाने
में
तुम
अपना
रास्ता
बदलो
नहीं
तो
फिर
मैं
हूॅं
बद-नाम
वैसे
ही
ज़माने
में
- Manish Yadav
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अब
मैं
क्या
अपनी
मोहब्बत
का
भरम
भी
न
रखूँ
मान
लेता
हूँ
कि
उस
शख़्स
में
था
कुछ
भी
नहीं
Jawwad Sheikh
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तुम
मेरी
पहली
मोहब्बत
तो
नहीं
हो
लेकिन
मैंने
चाहा
है
तुम्हें
पहली
मोहब्बत
की
तरह
Wasi Shah
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मुहब्बत
उठ
गई
दोनों
घरों
से
सुना
है
एक
ख़त
पकड़ा
गया
है
Anjum Ludhianvi
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लिखी
होगी
मोहब्बत
जिन
सफ़ों
पर
मेरा
दावा
है
वो
नम
ही
मिलेंगे
किसी
दिन
ऊब
जाओगे
सभी
से
तुम्हें
उस
रोज़
फिर
हम
ही
मिलेंगे
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Ritesh Rajwada
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तुम्हारा
नाम
लिया
था
कभी
मोहब्बत
से
मिठास
उस
की
अभी
तक
मेरी
ज़बान
में
है
Abbas Dana
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मुझे
उस
सेे
मुहब्बत
सच
बड़ी
महँगी
पड़ेगी
अकेलेपन
से
उसने
इश्क़
ऐसा
कर
लिया
है
Anukriti 'Tabassum'
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इक
शहंशाह
ने
दौलत
का
सहारा
ले
कर
हम
ग़रीबों
की
मोहब्बत
का
उड़ाया
है
मज़ाक़
Sahir Ludhianvi
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दिल
जिसका
मोहब्बत
में
गिरफ़्तार
रहा
है
वो
मेरी
मदद
के
लिए
तैयार
रहा
है
आग़ाज़-ए-मोहब्बत
का
फ़साना
भी
था
दिलचस्प
बर्बादी
का
क़िस्सा
भी
मज़ेदार
रहा
है
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Obaid Azam Azmi
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ये
ज़माना
ये
दौर
कुछ
भी
नहीं
बस
मोहब्बत
है
और
कुछ
भी
नहीं
Vishal Singh Tabish
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मुहब्बत
आपसे
करना
कभी
आसाँ
नहीं
था
पर
बिना
कश्ती
के
दरिया
पार
करना
शौक़
है
मेरा
Tanoj Dadhich
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क्यूँ
तेरी
कल्पना
मैं
करूँॅं
उम्रभर
क्यूँ
तेरी
वेदना
में
फिरूॅं
दर-ब-दर
Manish Yadav
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हमें
दिल
को
लगाना
चाहिए
था
इसे
भी
आज़माना
चाहिए
था
अकेले
का
नहीं
था
देख
ज़िम्मा
तुझे
भी
पास
आना
चाहिए
था
सबब
होता
नहीं
है
शाद
का
यूँँ
हमें
कोई
बहाना
चाहिए
था
हुई
क्या
थी
ख़ता
मेरी
तरफ़
से
हक़ीक़त
को
बताना
चाहिए
था
ख़ुशी
के
क़त्ल
के
बाबत
उदासी
तुझे
भी
जेल
जाना
चाहिए
था
बहक
जाते
मगर
हम
भी
यहाँ
पर
ज़रा
मौसम
सुहाना
चाहिए
था
किताबों
की
तहों
के
बीच
सूखे
गुलाबों
को
दिखाना
चाहिए
था
किनारे
बैठकर
अब
सोचना
क्या
हमें
तो
डूब
जाना
चाहिए
था
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Manish Yadav
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भूल
जाने
में
जिनको
ज़माने
लगे
अब
की
बारिश
में
वो
याद
आने
लगे
यह
गया
है
फ़क़त
एक
ही
रास्ता
फिर
यहीं
दिल
किसी
भी
बहाने
लगे
जब
कभी
भी
सुनाई
दिली
दास्ताँ
लोग
ज़ख़्मों
को
अपने
दिखाने
लगे
इक
नया
घर
बनाने
की
ख़्वाहिश
में
अब
हम
पुरानी
दिवारें
गिराने
लगे
आने
जाने
की
जिनकी
न
रहती
ख़बर
इश्क़
में
वो
ही
मौसम
सुहाने
लगे
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Manish Yadav
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रही
होगी
हवा
की
कुछ
तो
रंजिश
चराग़ों
को
बुझा
देती
है
आकर
कभी
कर
लूँ
यहाँ
पर
मैं
सुसाइड
ये
ख़ामोशी
डरा
देती
है
आकर
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Manish Yadav
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ख़िज़ाँ
में
अब
बहार
आई
है
फिर
से
हवा
गुलशन
में
लहराई
है
फिर
से
इसे
एहसास
तेरे
जाने
का
है
मिरी
ये
आँख
पथराई
है
फिर
से
मुझे
मिलना
है
फिर
उस
बे-वफ़ा
से
पुरानी
याद
दफ़नाई
है
फिर
से
क़दम
रक्खे
हैं
उसने
फिर
से
बाहर
ये
देखो
शाम
शरमाई
है
फिर
से
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Manish Yadav
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