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Marghoob Inaam Majidi
tere khaatir hua hoon aise ruswa
tere khaatir hua hoon aise ruswa | तेरे ख़ातिर हुआ हूॅं ऐसे रुसवा
- Marghoob Inaam Majidi
तेरे
ख़ातिर
हुआ
हूॅं
ऐसे
रुसवा
अजब
औबाश
बन
कर
रह
गया
हूॅं
कि
मेरी
रूह
तो
तुम
मार
डाले
मैं
ज़िंदा
लाश
बन
कर
रह
गया
हूॅं
- Marghoob Inaam Majidi
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जौन
को
रोज़
पढ़
रहा
है
वो
यानी
हर
ग़म
में
आश्ना
है
वो
है
वो
जिसके
ख़याल
में
गुमसुम
कोई
लड़की
नहीं
बला
है
वो
तू
समझता
है
उसको
नाज़ुक
सा
माँओं
के
लाल
खा
गया
है
वो
बे-झिझक
मिल
रहा
है
वो
मुझ
सेे
दर्ज-ए-अव्वल
का
बे-वफ़ा
है
वो
सुर्ख़
रंगों
से
ऐसी
क्या
रग़बत
हर
पलक
ख़ून
थूकता
है
वो
तुम
करोगे
बराबरी
उसकी
वो
जो
है
जौन
एलिया
है
वो
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अब
तो
कुछ
भी
हसीं
नहीं
लगता
कोई
ईहाश
है
मेरे
अंदर
जिस्म
में
इक
अजब
सी
अकड़न
है
मानो
एक
लाश
है
मेरे
अंदर
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तू
तो
फिर
ठीक
है
नागिन
ने
डसा
है
तुझको
मुझको
अफ़सोस
है
तितली
से
डसे
जाने
का
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ये
किस
गुमान
में
हो
तुम
वो
लौट
आएगा
ये
किस
गुमान
में
ख़ुद
को
उजाड़
रक्खा
है
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साठ
सत्तर
की
ज़िंदगानी
है
कैसे
फिर
इश्क़
जावेदानी
है
एक
तो
ख़ासियत
बहकने
की
उस
पे
बे-ढब
सी
ये
जवानी
है
ये
जो
बेरंग
लग
रहा
हूँ
मैं
एक
तितली
की
मेहरबानी
है
उसने
दौलत
का
इंतिख़ाब
किया
लगती
पगली
है
पर
सियानी
है
अब
के
हरगिज़
तुझे
भुलाऊँगा
अब
के
ये
बात
मैंने
ठानी
है
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Marghoob Inaam Majidi
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