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Lalit Mohan Joshi
KHushi meri use kab yaar ye to raas aayi hai
KHushi meri use kab yaar ye to raas aayi hai | ख़ुशी मेरी उसे कब यार ये तो रास आई है
- Lalit Mohan Joshi
ख़ुशी
मेरी
उसे
कब
यार
ये
तो
रास
आई
है
कहाँ
नादान
लड़की
अब
मिरे
तो
पास
आई
है
मिरे
तो
ज़ेहन
से
यादें
निकलती
क्यूँँ
नहीं
उसकी
मगर
क्यूँँ
याद
रहने
साथ
बारह-मास
आई
है
- Lalit Mohan Joshi
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बादलों
में
से
छनता
हुआ
नूर
देख
ऐसी
रौशन
जबीं
है
मेरे
यार
की
Afzal Ali Afzal
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एक
सीता
की
रिफ़ाक़त
है
तो
सब
कुछ
पास
है
ज़िंदगी
कहते
हैं
जिस
को
राम
का
बन-बास
है
Hafeez Banarasi
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अब
उस
सेे
दोस्ती
है
जिस
सेे
कल
मुहब्बत
थी
अब
इस
सेे
ज़्यादा
बुरा
वक़्त
कुछ
नहीं
है
दोस्त
Vishal Singh Tabish
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्योहार
मनाना
होता
है
Hasan Raqim
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बंद
कमरे
में
हज़ारों
मील
अब
चलते
हैं
हम
काफ़ी
महँगी
पड़
रही
है
शा'इरी
से
दोस्ती
Ashraf Jahangeer
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मैं
दिल
को
सख़्त
करके
उस
गली
जा
तो
रहा
हूँ
दोस्त
करूँँगा
क्या
अगर
वो
ही
शरारत
पर
उतर
आया
Harsh saxena
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अब
दोस्त
कोई
लाओ
मुक़ाबिल
में
हमारे
दुश्मन
तो
कोई
क़द
के
बराबर
नहीं
निकला
Munawwar Rana
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फिर
आज
यारों
ने
तुम्हारी
बात
की
फिर
यार
महफ़िल
में
मिरी
खिल्ली
उड़ी
Harsh saxena
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कुछ
तो
कर
आदाब-ए-महफ़िल
का
लिहाज़
यार
ये
पहलू
बदलना
छोड़
दे
Waseem Barelvi
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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शा'इरी
का
है
हुनर
जब
से
यूँँ
आया
फिर
गले
से
यार
फंदा
भी
हटाया
मैं
ग़ज़ल
लिखता
रहा
सब
दर्द
की
ही
यूँँ
मोहब्बत
को
सभी
ने
फिर
लुटाया
ज़ख़्म
की
क्या
उम्र
होगी
सामने
अब
शा'इरी
का
फ़न
ये
हमने
जब
चलाया
अश्क
आँखों
से
कभी
बहने
लगे
तो
फिर
कही
दरिया
से
उनको
यूँँ
मिलाया
जंग
को
जब
जीतने
का
ख़ुद
हुनर
हो
हार
को
फिर
यूँँ
नहीं
माथे
लगाया
कह
दिया
है
आसमाँ
से
मैंने
ये
तो
ख़ैर
अब
उसकी
नहीं
गर
ग़म
गिराया
खिल
गया
चेहरा
सभी
का
शा'इरी
से
जब
'ललित'
ने
शे'र
अपना
इक
सुनाया
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Lalit Mohan Joshi
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माज़ी
से
डरकर
बहुत
ही
सहम
जाती
शायद
उस
सेे
वो
उभरना
चाहती
है
Lalit Mohan Joshi
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क्यूँँ
दिया
है
दर्द
तुमने
इल्म
इसका
क्या
तुम्हें
है
Lalit Mohan Joshi
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मौत
ख़ामोशी
से
बैठी
पास
मेरे
इसलिए
शायद
लगे
ये
ग़म
के
फेरे
बाँटता
फिरता
हूँ
अपना
दर्द
सब
से
पर
कहाँ
ज़ख़्मों
को
मरहम
मिलता
मेरे
इक
नहीं
सौ
सौ
सवालों
से
घिरा
हूँ
उस
में
से
शायद
न
जाने
कितने
तेरे
बन
के
ज़िंदा
लाश
हूँ
देखो
मैं
ऐसे
जैसे
तन
लूटे
तवायफ़
के
लुटेरे
इक
नदी
है
दूर
मुझ
सेे
क्यूँँ
ख़फ़ा
है
क्यूँँ
नहीं
होते
अँधेरे
के
सवेरे
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Lalit Mohan Joshi
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जिस्म
पर
तो
पोशाक
अच्छी
पहन
ली
बात
पर
सबने
तल्ख़
बोली
बहुत
है
Lalit Mohan Joshi
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