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Kunu
kahaan ham sukhan ka qamar jaante hain
kahaan ham sukhan ka qamar jaante hain | कहाँ हम सुखन का क़मर जानते हैं
- Kunu
कहाँ
हम
सुखन
का
क़मर
जानते
हैं
मगर
इस
इरम
का
असर
जानते
हैं
हुआ
इक
कहानी
तमाशा
क़ज़ा
जब
ख़फ़ा
सब
गुलिस्ताँ
ख़बर
जानते
हैं
जहाँ
भी
अदा
बारहा
इल्तिजा
तो
वफ़ा
से
अमाँ
की
नजर
जानते
हैं
नहीं
है
जुनूँ
दरमियाँ
हम-ज़बाँ
जब
बयाबाँ
बयाबाँ
बसर
जानते
हैं
हुआ
है
मुक़र्रर
रवानी
कुनू
सब
भला
अब
इसी
में
जिगर
जानते
हैं
- Kunu
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मरता
गया
ईमान
बस
ज़िन्दा
रहा
इंसान
बस
मुझ
तक
दवा
भी
दर्द
है
हूँ
नाज़
से
शमशान
बस
अब
तो
समझ
लो
आबरू
ख़ुद
से
हो
सब
अनजान
बस
नफ़रत
नहीं
रू
होगा
गर
पढ़
आए
हो
इम्कान
बस
मुझ
तक
नहीं
आ
सकते
सब
ग़म
का
हूँ
इक
मीज़ान
बस
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Kunu
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नारसा
मर्द
फ़ज़ा
तक
क़ाबिल
बारहा
रात
कटा
पत्थर
में
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ये
न
था
कि
हसीं
नहीं
थे
हम
बारहा
बस
हमीं
नहीं
थे
हम
ज़िन्दगानी
हुई
अदा
ऐसे
पीठ-पीछे
यक़ीं
नहीं
थे
हम
मुफ़्लिसी
सब
उड़ा
गई
मंज़िल
यार
हासिल
कहीं
नहीं
थे
हम
इक
क़ज़ा
भी
अता
नहीं
मुझ
पे
किस-क़दर
मह-जबीं
नहीं
थे
हम
नाज
कह
कर
हुआ
सही
कामिल
मर्द
भी
जा-नशीं
नहीं
थे
हम
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हम-सुख़न
नीमजाँ
हुआ
शायद
इक
गदाई
समाँ
बना
शायद
अब
नहीं
जज़्ब
भा
रहा
कोई
ना-रसा
रह
गया
अदा
शायद
कुछ
कभी
बच
गया
गुरेज़ाँ
से
बस
वही
आज
भी
सज़ा
शायद
राज़
थे
जो
गुदाज़
पर्चा
में
सब
मिरे
बाद
ही
जला
शायद
जाम
कह
कर
पिला
दिया
क्या
ये
बेमज़ा
है
नया
नशा
शायद
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गुफ़्तगू
और
नहीं
वहमन
से
सब
वफ़ा
पीर
दवा
परवर
में
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