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Krishan Kant Saini
KHvaab bhi ja na paa.e mere jahaan
KHvaab bhi ja na paa.e mere jahaan | ख़्वाब भी जा न पाएँ मेरे जहाँ
- Krishan Kant Saini
ख़्वाब
भी
जा
न
पाएँ
मेरे
जहाँ
तेरी
मंज़िल
वही
डगर
है
क्या
- Krishan Kant Saini
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बस
जनाज़े
पे
तू
ही
मेरे
पास
हो
उस
कफ़न
में
मिरे
बस
तेरी
बास
हो
पास
हैं
तेरे
तो
लाख
मद्दाह
पर
चाहने
वाला
इक
मेरे
भी
पास
हो
मैं
जता
दूँगा
यारो
मोहब्बत
ये
पर
उसके
हाँ
करने
की
कोई
तो
आस
हो
रात
दिन
बस
यही
सोचता
हूँ
मैं
अब
जो
न
हो
साथ
तो
ख़्वाब
में
पास
हो
चाहता
हूँ
मैं
जीना
ख़ुशी
से
मगर
चाहता
हूँ
उदासी
भी
अब
पास
हो
मेरे
रोने
पे
जिसके
निकल
आएँ
अश्क
ज़िंदगी
में
कोई
इतना
भी
ख़ास
हो
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Krishan Kant Saini
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एक
दिल
ज़ख़्म
लाखों
ये
क्या
हो
गया
मैं
जिसे
चाहता
था
ख़फ़ा
हो
गया
एक
ज़िद
थी
कि
मैं
छोड़
दूँ
ये
जहाँ
एक
ज़िद
में
ही
ख़ुद
से
जुदा
हो
गया
मैं
जिसे
ख़्वाब
में
मानता
था
मिरा
अस्ल
में
वो
किसी
का
ख़ुदा
हो
गया
सोचता
रहता
हूँ
अपने
बारे
में
अब
क्या
हुआ
करता
था
और
क्या
हो
गया
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Krishan Kant Saini
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तू
मुझे
कल
ही
मिला
है
पर
बता
देता
हूँ
अब
बिछड़ने
वाले
ख़ुद
को
ही
सज़ा
देते
हैं
Krishan Kant Saini
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रस्सी
वो
देखता
ही
रहा
टकटकी
लगाए
जब
तक
कि
घर
में
बिल्कुल
अँधेरा
नहीं
हुआ
Krishan Kant Saini
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एक
चारा-गर
से
पूछा
करता
था
वो
रोगी
इश्क़
में
ज़ख़्मी
हो
गर
तो
क्या
दवा
देते
हैं
Krishan Kant Saini
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