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Rohan Hamirpuriya
garmi dilli kii sah nahin paate
garmi dilli kii sah nahin paate | गर्मी दिल्ली की सह नहीं पाते
- Rohan Hamirpuriya
गर्मी
दिल्ली
की
सह
नहीं
पाते
बात
करते
हैं
साथ
रहने
की
- Rohan Hamirpuriya
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जहाँ
सारा
है
रौशन
और
दिया
जलता
है
हर
दर
पे
दिवाली
की
चमक
से
चाँदनी
है
रात
हर
घर
में
Rohan Hamirpuriya
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तुझ
सेे
जुदा
है
मेरा
तौर-ए-ज़िन्दगी
उम्मीद
पे
हरगिज़
नहीं
ज़िंदा
रखा
Rohan Hamirpuriya
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बीस
की
है
वो
बच्ची
नइँ
फिर
भी
इशारा
समझी
नइँ
उस
से
जुदा
हुए
हैं
तो
बज़्म
में
गिनती
होती
नइँ
शहर
बुला
रहा
था
पर
गाँव
की
रेत
छोड़ी
नइँ
कहता
रहा
उतरने
को
हमने
भी
कश्ती
छोड़ी
नइँ
गाँठ
रहेगी
रिश्ते
में
सोच
के
डोर
जोड़ी
नइँ
रोती
रही
वो
रस्ते
भर
बाप
ने
कार
रोकी
नइँ
सारे
जला
दिए
थे
ख़त
याद
की
राख
ढोई
नइँ
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तजरबा
है
तो
पता
होगा
इश्क़
का
अंजाम
क्या
होगा
फिर
मुहब्बत
उस
सेे
गर
होगी
ज़ख़्म
फिर
कोई
हरा
होगा
है
मुकरने
का
इरादा
गर
देख
लेना
फिर
बुरा
होगा
पहले
से
था
इल्म
ये
सब
को
राब्ता
उस
सेे
सज़ा
होगा
बिन
पिए
हम
जो
बहकते
हैं
उसकी
आँखों
का
नशा
होगा
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Rohan Hamirpuriya
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मौक़ा
मिलते
ही
वार
करती
है
ज़ीस्त
कब
इंतिज़ार
करती
है
ख़्वाब
आँखों
में
जब
भी
पलते
हैं
ज़िंदगी
तार-तार
करती
है
ज़िंदगी
लगती
है
किनारे
पे
लाश
जब
दरिया
पार
करती
है
जुस्तजू
में
भटकते
रहते
हैं
आरज़ू
बेक़रार
करती
है
जिस
से
मिलती
है
मुस्कुरा
के
वो
उस
को
अपना
शिकार
करती
है
मैं
ही
क्या
हर
कोई
समझ
बैठा
सिर्फ़
वो
मुझ
से
प्यार
करती
है
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Rohan Hamirpuriya
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