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Rohan Hamirpuriya
gham ka hisaab kya karen
gham ka hisaab kya karen | ग़म का हिसाब क्या करें
- Rohan Hamirpuriya
ग़म
का
हिसाब
क्या
करें
लिख
कर
किताब
क्या
करें
सीरत
से
जानता
है
जो
उस
से
हिजाब
क्या
करें
अनजान
है
वो
जान
कर
बोलो
जनाब
क्या
करें
शीशे
से
अब
नहीं
हया
ख़ुद
से
नक़ाब
क्या
करें
हासिल
हो
जिनको
लब
तेरे
पी
कर
शराब
क्या
करें
- Rohan Hamirpuriya
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थोड़ा
दूर
वहशत
से
सौ
क़दम
मुहब्बत
से
ग़ुस्सा
और
वो
भी
माँ
पर
पेश
आ
नज़ाकत
से
हँसना
रोना
होता
है
आपकी
इजाज़त
से
जो
भी
करना
है
कर
ले
बोल
आया
नफ़रत
से
मैं
गुलाब
लाया
तो
देखा
उसने
हैरत
से
अच्छा
पहले
तुम
बोलो
चुप
से
क्यूँ
हो
मुद्दत
से
इश्क़
में
हो
रुस्वा
गर
काम
लेना
हिम्मत
से
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काम
न
आती
है
बंदगी
कोई
आशिक़
जब
वादे
से
मुकरते
हैं
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तेरा
सहारा
हो
जाएगा
साथ
गुज़ारा
हो
जाएगा
तुम
मेरे
हो
जाओगे
जब
सब
सेे
किनारा
हो
जाएगा
बोला
तो
था
उसने
हम
सेे
इक
दिन
हमारा
हो
जाएगा
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नई
है
मुहब्बत
नया
है
जुनूँ
है
उसको
झिझक
साथ
चलते
हुए
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सोच
रही
है
मेरे
साथ
वो
चलते
हुए
देख
न
ले
कूचे
से
कोई
निकलते
हुए
आप
ही
बनना
पड़ा
अपना
ही
रहबर
मुझे
उम्र
हुई
दूजों
के
रस्तों
पे
चलते
हुए
अपना
हो
या
ग़ैर
का
चाहे
किसी
का
हो
घर
देखा
नहीं
जाता
है
घर
कोई
जलते
हुए
याद
नहीं
आती
है
उसको
मेरी
अब
मगर
देखे
हैं
पत्थर
के
दिल
मैंने
पिघलते
हुए
दूर
निकल
आया
वो
तोड़
के
सब
बंदिशें
देखा
है
दौलत
को
यूँँ
रिश्ते
निगलते
हुए
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Rohan Hamirpuriya
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