mere is zakhm-e-dil se hijr ka manzar nahin jaata | मेरे इस ज़ख़्म-ए-दिल से हिज्र का मंज़र नहीं जाता

  - Kartik tripathi
मेरेइसज़ख़्म-ए-दिलसेहिज्रकामंज़रनहींजाता
मगरआँखोंसेकोईमसअलाबाहरनहींजाता
मिरीउसनेतोइकसौइकदफ़ाझूटी-क़समखाई
अगरसचमेंमुहब्बतहोतीतोमैंमरनहींजाता
फ़क़तइककमरेतकमहदूदहैअबतोमिरीदुनिया
कोईअबमरहीनाजाएमैंउसकेघरनहींजाता
वोतोअच्छाथाजातेजातेमैंनेबद्दुआदेदी
शब-ए-रुख़्सतभीवर्नावोगलेलगकरनहींजाता
मैंपढ़तारहगयाऔरलेगयाउसकोकोईअफ़सर
कहानीजोभीहोपरबीचकाबंदरनहींजाता
  - Kartik tripathi
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