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Aashish kargeti 'Kash'
badal kar sitam-gar tarqqi hui aur
badal kar sitam-gar tarqqi hui aur | बदल कर सितम-गर तरक़्क़ी हुई और
- Aashish kargeti 'Kash'
बदल
कर
सितम-गर
तरक़्क़ी
हुई
और
बहुत
कुछ
हुआ
पाँच
सालों
के
अंदर
दफन
कर
दिए
है
सभी
राज़
ख़ुद
के
किताबों
में
मेरी
सवालों
के
अंदर
- Aashish kargeti 'Kash'
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लजा
कर
शर्म
खा
कर
मुस्कुरा
कर
दिया
बोसा
मगर
मुँह
को
बना
कर
Unknown
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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वो
अपने
चेहरे
में
सौ
आफ़ताब
रखते
हैं
इसीलिए
तो
वो
रुख़
पे
नक़ाब
रखते
हैं
Hasrat Jaipuri
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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तू
इस
तरह
से
मिला
फिर
मलाल
भी
न
रहा
तेरे
ख़याल
में
अपना
ख़याल
भी
न
रहा
कुछ
इस
अदास
झुकी
थी
हया
से
आँख
तेरी
हमारी
आँख
में
कोई
सवाल
भी
न
रहा
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Subhan Asad
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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है
देखने
वालों
को
सँभलने
का
इशारा
थोड़ी
सी
नक़ाब
आज
वो
सरकाए
हुए
हैं
Arsh Malsiyani
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तुझको
बतलाता
मगर
शर्म
बहुत
आती
है
तेरी
तस्वीर
से
जो
काम
लिया
जाता
है
Tehzeeb Hafi
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शाम
तो
रात
से
सियानी
है
शाम
को
रात
की
तलब
है
क्यूँ
?
Aashish kargeti 'Kash'
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रूठी
हुई
है
ज़िन्दगी
फिर
भी
मिरे
बिस्तर
पे
इक
सिलवट
नज़र
आती
नहीं
Aashish kargeti 'Kash'
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खाना
कपड़े
गाड़ी
ज़ेवर
लूँगा
मैं
अब
के
अरसे
इतना
कुछ
कर
लूँगा
मैं
Aashish kargeti 'Kash'
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हम
दोनों
को
एक
करे
तो
अच्छा
है
काम
ज़माना
नेक
करे
तो
अच्छा
है
Aashish kargeti 'Kash'
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गुफ़्तगू
तू
न
अरबदा-जू
कर
जैसा
मैंने
किया
नहीं
तू
कर
लग
रहा
था
कई
खिलेंगे
गुल
हाथ
घबरा
गए
उसे
छू
कर
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Aashish kargeti 'Kash'
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