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Meem Alif Shaz
khulta nahin hai rastaa meraa
khulta nahin hai rastaa meraa | खुलता नहीं है रस्ता मेरा
- Meem Alif Shaz
खुलता
नहीं
है
रस्ता
मेरा
कैसे
होगा
गुज़ारा
मेरा
अपने
दर
से
न
लौटा
मुझ
को
तू
है
तो
है
सहारा
मेरा
उस
क़े
ख़त
को
जलाऊँ
कैसे
उस
में
दिल
तो
जलेगा
मेरा
मेरे
मुख़ालिफ़
क्या
कर
लेंगे
बूढ़ा
नहीं
है
जज़्बा
मेरा
घर
के
अंदर
ग़ुर्बत
देखो
चादर
का
है
साया
मेरा
मेरी
फ़कीरी
पे
हँसना
मत
सोने
का
है
काँसा
मेरा
- Meem Alif Shaz
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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हर
इक
सू
हैं
दर-ओ-दीवार
लेकिन
मुयस्सर
है
नहीं
घर-बार
लेकिन
Umrez Ali Haider
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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वरना
तो
ये
दीवार-ओ-दर
लगता
है
तुम
होती
हो
घर
में
तो
घर
लगता
है
Bhaskar Shukla
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गर
बाज़ी
इश्क़
की
बाज़ी
है,
जो
चाहो
लगा
दो
डर
कैसा
गर
जीत
गए
तो
क्या
कहना,
हारे
भी
तो
बाज़ी
मात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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तेरे
ग़म
का
हिसाब
कैसे
दूँ
अपने
ग़म
में
उलझ
रहा
हूँ
मैं
Meem Alif Shaz
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ज़िन्दगी
को
ढूँढने
में
यह
जवानी
भी
गई
ख़ूब-सूरत
सी
हमारी
वो
कहानी
भी
गई
बचपने
में
ख़ूब
चलती
थी
हमारी
ज़िन्दगी
जब
से
फ़िक्रें
आई
हैं
इस
की
रवानी
भी
गई
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Meem Alif Shaz
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है
समझदार
तो
ये
इशारा
समझ
अपनी
शोहरत
को
तू
इक
नज़ारा
समझ
जो
हुआ
सो
हुआ
अब
भुला
दे
उसे
इस
मोहब्बत
को
मेरी
दुबारा
समझ
उस
की
बाहों
में
भी
तू
अगर
ख़ुश
नहीं
बेवफ़ाई
का
इस
को
इशारा
समझ
बात
गर
चाँद
से
हो
न
पाई
तिरी
इस
मुलाक़ात
को
इक
नज़ारा
समझ
इश्क़
के
बाद
भी
तू
अगर
है
उदास
इस
इनायत
को
अपना
ख़सारा
समझ
हम
बड़ों
की
दुआएँ
भी
ली
है
अगर
दरिया
के
हर
भँवर
को
किनारा
समझ
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Meem Alif Shaz
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सब
को
पैसों
का
दीवाना
होना
है
फिर
सब
से
बेहद
बेगाना
होना
है
Meem Alif Shaz
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ये
जो
दिल
है
अजीब
है
यारो
मेरे
दिल
के
क़रीब
है
यारो
इस
से
हुशयार
रहना
पड़ता
है
इश्क़
का
यह
अदीब
है
यारो
चलते
चलते
बहकने
लगता
है
हौसले
से
ग़रीब
है
यारो
हुस्न
क्या
है
इसी
से
पूछो
तुम
हुस्न
का
यह
तबीब
है
यारो
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Meem Alif Shaz
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