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Meem Alif Shaz
hamaara ik musahib bhi nahin hai
hamaara ik musahib bhi nahin hai | हमारा इक मुसाहिब भी नहीं है
- Meem Alif Shaz
हमारा
इक
मुसाहिब
भी
नहीं
है
बहुत
ग़ुरबत
हमें
जब
से
मिली
है
- Meem Alif Shaz
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सज़ा
कितनी
बड़ी
है
गाँव
से
बाहर
निकलने
की
मैं
मिट्टी
गूँधता
था
अब
डबलरोटी
बनाता
हूँ
Munawwar Rana
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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दफ़्तरी
से
तो
फ़क़त
रोटी
ही
चल
सकती
है
अपनी
साँसों
की
ख़ातिर
ज़रूरी
शा'इरी
करना
है
साहिब
Harsh saxena
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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तुझे
न
आएँगी
मुफ़्लिस
की
मुश्किलात
समझ
मैं
छोटे
लोगों
के
घर
का
बड़ा
हूॅं
बात
समझ
Umair Najmi
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हसीं
ख़्वाबों
को
अपने
साथ
में
ढोती
हुई
आंँखे
बहुत
प्यारी
लगी
हमको
तेरी
सोती
हुई
आंँखे
मोहब्बत
में
ये
दो
क़िस्से
सुना
है
रोज़
होते
हैं
कभी
हँसता
हुआ
चेहरा
कभी
रोती
हुई
आंँखे
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Naimish trivedi
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ये
तेरे
ख़त
ये
तेरी
ख़ुशबू
ये
तेरे
ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ
हैं
तेरे
कौल
और
क़सम
की
तरह
गुज़िश्ता
साल
मैंने
इन्हें
गिनकर
रक्खा
था
किसी
ग़रीब
की
जोड़ी
हुई
रक़म
की
तरह
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Jaun Elia
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ये
टूटी
चटाई
ये
मिटटी
का
बर्तन
हिकारत
से
नादान
क्या
देखता
है
गरीबी
मोहम्मद
के
घर
में
पली
है
मेरे
घर
का
सामान
क्या
देखता
है
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Anjuman rahi raza
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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न
जाने
कौन
सी
दौलत
अता
करता
है
रब
इनको
किसी
भी
बाप
को
मुफ़्लिस
कभी
देखा
नहीं
मैंने
Saheb Shrey
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रातों
की
बेचैनी
हम
से
पूछो
पूरी
फ़िक्र
बिछाकर
सो
जाते
हैं
Meem Alif Shaz
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मैं
बना
हूँ
जो
अब
ज़रा
सा
कुछ
दोस्त
भी
है
बुझा
बुझा
सा
कुछ
अब
मुलाक़ात
भी
नहीं
करता
वो
मुझे
लगता
है
ख़फ़ा
सा
कुछ
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Meem Alif Shaz
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अच्छी
लगती
है
उस
की
चालाकी
पे
चालाकी
वो
कॉफ़ी
कम
नहीं
देता
है
कप
छोटा
देता
है
Meem Alif Shaz
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परिंदे
चाहते
हैं
ख़ूब
उड़ना
मगर
हम
तो
ग़ुलामी
चाहते
हैं
Meem Alif Shaz
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है
समझदार
तो
ये
इशारा
समझ
अपनी
शोहरत
को
तू
इक
नज़ारा
समझ
जो
हुआ
सो
हुआ
अब
भुला
दे
उसे
इस
मोहब्बत
को
मेरी
दुबारा
समझ
उस
की
बाहों
में
भी
तू
अगर
ख़ुश
नहीं
बेवफ़ाई
का
इस
को
इशारा
समझ
बात
गर
चाँद
से
हो
न
पाई
तिरी
इस
मुलाक़ात
को
इक
नज़ारा
समझ
इश्क़
के
बाद
भी
तू
अगर
है
उदास
इस
इनायत
को
अपना
ख़सारा
समझ
हम
बड़ों
की
दुआएँ
भी
ली
है
अगर
दरिया
के
हर
भँवर
को
किनारा
समझ
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Meem Alif Shaz
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