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Irshad Siddique "Shibu"
uthaana ho uthaana tum alam koina tum khanjar uthaana aur na bam koi
uthaana ho uthaana tum alam koina tum khanjar uthaana aur na bam koi | उठाना हो उठाना तुम अलम कोई
- Irshad Siddique "Shibu"
उठाना
हो
उठाना
तुम
अलम
कोई
न
तुम
ख़ंजर
उठाना
और
न
बम
कोई
मोहब्बत
कीजे
ताक़त
है
मोहब्बत
में
यक़ीं
कीजे
नहीं
नफ़रत
में
दम
कोई
कि
नाता
आप
से
हम
ऐसे
तोड़ेंगे
कि
जैसे
तोड़ता
है
जज
क़लम
कोई
ये
तन्हा
रातें
काटे
दौरे
है
मौला
कि
इस
अहमक़
को
भी
दे
दे
सनम
कोई
नहीं
है
जिसका
कुछ
भी
उस
में
ही
हम
है
है
दुनिया
जिसकी
उस
में
नइँ
है
हम
कोई
- Irshad Siddique "Shibu"
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ज़्यादा
मीठा
हो
तो
चींटा
लग
जाता
है
सच्चे
इश्क़
को
अक्सर
बट्टा
लग
जाता
है
हमने
अपनी
जान
गंवाई
तब
जाना
भाव
मिले
तो
कुछ
भी
सट्टा
लग
जाता
है
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Ritesh Rajwada
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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ये
तेरे
ख़त
ये
तेरी
ख़ुशबू
ये
तेरे
ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ
हैं
तेरे
कौल
और
क़सम
की
तरह
गुज़िश्ता
साल
मैंने
इन्हें
गिनकर
रक्खा
था
किसी
ग़रीब
की
जोड़ी
हुई
रक़म
की
तरह
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Jaun Elia
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तुम्हें
हुस्न
पर
दस्तरस
है
मोहब्बत
वोहब्बत
बड़ा
जानते
हो
तो
फिर
ये
बताओ
कि
तुम
उस
की
आँखों
के
बारे
में
क्या
जानते
हो
ये
जुग़राफ़िया
फ़ल्सफ़ा
साईकॉलोजी
साइंस
रियाज़ी
वग़ैरा
ये
सब
जानना
भी
अहम
है
मगर
उस
के
घर
का
पता
जानते
हो
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Tehzeeb Hafi
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जब
तलक
अनजान
थे
मेहफ़ूज़
थे
जान
लेना
जानलेवा
हो
गया
Vishal Bagh
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मैंने
अपनी
ग़ज़लें
खारिज
कर
डाली
सोचो
मेरी
जान
तुम्हारा
क्या
होगा
Talib Toofani
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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तीर
पर
तीर
लगाओ
तुम्हें
डर
किस
का
है
सीना
किस
का
है
मिरी
जान
जिगर
किस
का
है
Ameer Minai
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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मत
कर
मुझ
सेे
तू
ये
लकीर
की
बातें
नइँ
होतीं
इस
में
तक़दीर
की
बातें
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Irshad Siddique "Shibu"
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तू
हो
कर
भी
साथ
मिरा
नइँ
होता
क्या
ये
मेरे
साथ
बुरा
नइँ
होता
पत्थर
पत्थर
होता
है
और
कुछ
नइँ
रब
का
कोई
चेहरा
वेहरा
नइँ
होता
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जो
ग़ुस्सा
आ
गया
तो
क्या
ही
कर
लेंगे
ज़ुबाँ
ये
मेरी
गाली
भी
नहीं
देती
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कि
को'ई
चीज़
गर
तुझे
क़ुबूल
नइँ
हो
लाख
अच्छी
वो
मुझे
क़ुबूल
नइँ
तिरा
झगड़ना
मुझको
है
क़ुबूल
पर
तिरा
बिछड़ना
जाँ
मुझे
क़ुबूल
नइँ
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चंद
पैसे
क्या
कमाने
लग
गए
लोग
आलिम
को
पढ़ाने
लग
गए
जान
जिनपे
हम
लुटाने
लग
गए
वो
भी
हमको
ही
मिटाने
लग
गए
वो
हमेशा
से
जो
मेरे
पास
था
उसको
पाने
में
ज़माने
लग
गए
जिनके
आँसू
पोछे
मैंने
आँखों
के
वो
मुझे
आँखें
दिखाने
लग
गए
बाप
का
सर
से
जो
साया
क्या
उठा
ग़म
के
साए
हक़
जताने
लग
गए
रस्ता
जिनको
भी
बताया
मैंने
वो
मुझको
ही
रस्ता
दिखाने
लग
गए
ख़ुद
को
अब
भी
ढूँढने
में
हूँ
लगा
दोस्त
सब
मेरे
कमाने
लग
गए
वो
जो
मेरे
क़त्ल
के
साज़िश
में
थे
मुझ
को
देखा
मुस्कुराने
लग
गए
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