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Nasir Hayaat
aulaad se kahunga ke shirkat karen sabhi
aulaad se kahunga ke shirkat karen sabhi | औलाद से कहूँगा के शिरकत करें सभी
- Nasir Hayaat
औलाद
से
कहूँगा
के
शिरकत
करें
सभी
बस
वो
नज़र
न
आए
मिरे
इंतिक़ाल
में
- Nasir Hayaat
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एक
दूजे
को
बद्दुआ
की
जगह
अच्छा
होता
जो
हम
दु'आ
देते
Nasir Hayaat
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तुम
सेे
मिल
कर
ये
मैंने
जाना
है
ज़िंदगी
का
सफ़र
सुहाना
है
मुझ
सेे
क्या
चाहिए
तुम्हें
बोलो
प्यार
करना
है
या
निभाना
है
ठीक
से
अलविदाअ
कहना
था
ये
मुलाक़ात
तो
बहाना
है
ज़िंदगी
का
यही
तो
मतलब
है
कोई
आना
है
कोई
जाना
है
जान
पे
बन
गई
थी
मत
पूछो
इश्क़
मुश्किल
बड़ा
निभाना
है
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Nasir Hayaat
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अब
दु'आ
का
असर
नहीं
होता
उसका
ग़म
मुख़्तसर
नहीं
होता
Nasir Hayaat
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तूने
देखा
नहीं
मुझे
मुड़
कर
मैंने
कितनी
दफ़ा
पुकारा
था
Nasir Hayaat
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झूठी
क़स
में
किसी
की
खा
न
सके
अब
किसी
और
को
सता
न
सके
मेरे
दिल
की
ये
बद्दुआ
है
तुझे
तू
मुहब्बत
किसी
की
पा
न
सके
दिल
तिरा
तोड़े
कोई
तेरी
तरह
फिर
उसे
तू
कभी
भुला
न
सके
हम
मुहब्बत
में
बे-वफ़ा
निकले
जान
इक
दूजे
पे
लुटा
न
सके
हम
तिरे
दिल
में
तो
रहे
बरसों
पर
तिरी
ज़िंदगी
में
आ
न
सके
है
दु'आ
मेरी
ख़ुश
रहे
तू
मगर
ज़िंदगी
भर
सुकून
पा
न
सके
इत्तिफ़ाक़न
जो
सामने
आए
देखना
नज़रें
वो
उठा
न
सके
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Nasir Hayaat
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