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Hasan Raqim
jo KHud men jhaank ke dekha hazaar shar nikle
jo KHud men jhaank ke dekha hazaar shar nikle | जो ख़ुद में झाँक के देखा हज़ार शर निकले
- Hasan Raqim
जो
ख़ुद
में
झाँक
के
देखा
हज़ार
शर
निकले
जिन्हें
समझता
था
मंज़िल
महज़
सफ़र
निकले
कटे
दरख़्त
कई
आशियाँ
गिरे
कितने
न
जाने
कितने
परिंदों
के
ऐसे
पर
निकले
वो
जिस
ज़िया
को
सभी
शहर-ए-रौशनी
समझे
उस
एक
आग
में
झुलसे
तमाम
घर
निकले
मैं
उसके
दर
से
गुज़रते
हुए
रुका
कुछ
पल
उमीद
ले
के
कि
शायद
वो
देखकर
निकले
- Hasan Raqim
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किसी
की
मंज़िलों
का
अक्स
बनके
भी
तो
देख
किसी
को
रास्ता
होकर
गुज़र
भी
जाने
दे
Hasan Raqim
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दिल
ये
मेरा
ज़रा
चैन
पाता
नहीं
शक़्स
वो
जब
कभी
मुस्कुराता
नहीं
मैं
उसे
याद
करते
को
थकता
नहीं
और
मैं
ही
उसे
याद
आता
नहीं
दूरियों
का
सबब
ही
यही
है
की
मैं
इश्क़
करता
हूँ
उसको
बताता
नहीं
नींद
आँखों
में
आने
को
है
मुंतज़िर
मंज़र-ए-हिज्र
आँखों
से
जाता
नहीं
क्या
सितम
है
की
वो
याद
आता
भी
है
और
वो
ही
कभी
यार
आता
नहीं
कौन
सुनता
है
किसके
ग़मों
को
यहाँ
इसलिए
ग़म
किसी
को
सुनाता
नहीं
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Hasan Raqim
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इस
तरह
ज़िंदगी
को
जवाबों
से
भर
लिया
मैंने
तमाम
घर
को
किताबों
से
भर
लिया
Hasan Raqim
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जहाँ
सब
सितारों
से
करते
हैं
बातें
वहीं
रहता
हूँ
मैं
वहीं
घर
है
मेरा
Hasan Raqim
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अपनी
आदत
है
अगर
होना
तो
बस
एक
दिल
का
कहने
वाले
इसी
आदत
को
वफ़ा
कहते
हैं
Hasan Raqim
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