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Famyas Siwani
naseeb ki baat
naseeb ki baat | नसीब की बात
- Famyas Siwani
नसीब
की
बात
नसीब
नसीब
की
बात
होती
है
किसी
के
नसीब
में
हँसना
तो
किसी
का
रोना
होता
है
किसी
के
नसीब
में
जीना
तो
किसी
का
मरना
होता
है
ये
नसीब
की
ही
बात
होती
है
जो
उसको
अमीर
तो
मुझे
ग़रीब
बनाती
है
किसी
को
भरा
तो
किसी
को
भूखा
पेट
सुलाती
है
ये
नसीब
नसीब
की
बात
होती
है
जो
उसको
घर
तो
मुझे
घाट
ले
जाती
है
- Famyas Siwani
क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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पहले
तो
वो
हाथ
पकड़कर
कमरे
से
बाहर
लाया
और
फिर
मुझको
इस
दुनिया
में
यार
अकेला
छोड़
गया
Tanoj Dadhich
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उसी
मक़ाम
पे
कल
मुझ
को
देख
कर
तन्हा
बहुत
उदास
हुए
फूल
बेचने
वाले
Jamal Ehsani
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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शहर
का
तब्दील
होना
शाद
रहना
और
उदास
रौनक़ें
जितनी
यहाँ
हैं
औरतों
के
दम
से
हैं
Muneer Niyazi
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रूमाल
ले
लिया
है
किसी
माह-जबीन
से
कब
तक
पसीना
पोंछते
हम
आस्तीन
से
ये
आँसुओं
के
दाग़
हैं,
आँसू
ही
धोएँगे
ये
दाग़
धुल
न
पाएँगे
वाशिंग
मशीन
से
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Waseem Nadir
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जो
सावन
होते
सूखा,
उस
फूल
पे
लानत
हो
मुझ
पे
लानत,
तेरे
होते,
यार
उदासी
है
Siddharth Saaz
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पेड़
को
काटने
वाले
क्या
जाने
दुख
हम
गले
लग
नहीं
सकते
दीवार
से
Neeraj Neer
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तू
मेरे
अश्क
जितने
ही
बहाएगा
तिरा
भी
वक़्त
फिर
नज़दीक
आएगा
जलाया
इश्क़
में
कुछ
इस
क़दर
मुझको
ग़म-ए-दिल
तुझको
भी
हर-पल
जलाएगा
ख़ुदा
भी
देखता
ज़ुल्म-ओ-सितम
का
खेल
सितमगर
दिन
तिरा
भी
यूँँ
ही
आएगा
किसी
से
यूँँ
मुहब्बत
अब
नहीं
होगी
मुहब्बत
गर
हुई
वो
फिर
सताएगा
दिल-ओ-जाँ
लूट
कर
बे-घर
किया
तूने
तिरा
घर
भी
यूँँ
ही
कोई
लुटाएगा
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Famyas Siwani
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मुहब्बत
करती
हो
और
इस
ज़माने
से
भी
डरती
हो
दग़ा
भी
करती
हो
और
दिल
दुखाने
से
भी
डरती
हो
Famyas Siwani
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मैं
टूट
कर
कुछ
इस
तरह
बिखरा
पड़ा
हूँ
फर्श
पर
जैसे
फ़िज़ा
में
शाख़
से
पत्ते
बिखरते
टूट
कर
Famyas Siwani
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गर
मुलाक़ात
हो
रब
से
मेरी
तो
पूछूँगा
दर-हक़ीक़त
वो
जुदाई
का
सबब
और
क्या
था
Famyas Siwani
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जान
मैं
लिखूँ
भी
तो
क्या
लिखूँ
दर-ए-दिल
से
गर
लिखूँ
न
हाल-ए-दिल
तो
बता
लिखूँ
क्या
मैं
Famyas Siwani
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