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"Dharam" Barot
dhadkan u
dhadkan u | धड़कन ऊपर नीचे हो ही जाती थी
- "Dharam" Barot
धड़कन
ऊपर
नीचे
हो
ही
जाती
थी
जब
सामने
से
गुज़रे
धड़कन
मेरी
- "Dharam" Barot
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समझनी
शा'इरी
गर
तुमको
वैज्ञानिक
बनो
फिर
तुम
नई
हर
सोच
को
देते
नई
हर
दिन
उड़ानें
वो
"Dharam" Barot
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कर
गई
रुसवाई
हर
इक
काम
मेरे
क्यूँ
घटाए
आपने
भी
दाम
मेरे
ये
लिखा
सब
वास्ते
है
आपके
ही
कुछ
भी
हो
जाए
बुरा
फिर
नाम
मेरे
झूठ
से
पर्दा
उठाते
और
हर
इक
काम
करते
पार
सच
में
राम
मेरे
वास्ते
आवाज़
मेरे
जब
उठाई
सिर
ले
सकता
आपके
इल्ज़ाम
मेरे
पढ़
रहे
हैं
और
ये
मालूम
होता
फिर
न
इक
भी
भेजता
पैगाम
मेरे
लोकशाही
में
यही
लाइन
है
आसिर
लोग
रहते
साथ
में
हर-गाम
मेरे
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खिला
औरों
को
खाने
का
सलीक़ा
पता
है
मुस्कुराने
का
सलीक़ा
नए
अवतार
में
पा
गर
रहे
हो
नया
ये
ग़म
छुपाने
का
सलीक़ा
उसे
था
रूठना
कुछ
भी
कहूँ
तो
कहाँ
मिलता
मनाने
का
सलीक़ा
गया
था
हार
अर्जुन
जब
लड़ाई
दिया
कृष्णा
जिताने
का
सलीक़ा
कभी
तो
मैं
अधिक
भी
बोल
देता
यही
मेरा
जताने
का
सलीक़ा
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गुज़ारी
जाए
ऐसी
ज़िंदगी
कान्हा
करूँँ
बस
मैं
तेरी
ही
बंदगी
कान्हा
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धुन
को
पहले
तुम
सुनो
दो
चार
बार
गुनगुनाओ
फिर
उसे
हर
बार
यार
जब
हो
जाए
इक
ग़ज़ल
बढ़िया
धरम
फिर
सुनाओ
उस
ग़ज़ल
को
बार
बार
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