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"Dharam" Barot
tarqqi swaad se meethi lagegi
tarqqi swaad se meethi lagegi | तरक़्क़ी स्वाद से मीठी लगेगी
- "Dharam" Barot
तरक़्क़ी
स्वाद
से
मीठी
लगेगी
किसी
को
इस
सेे
भी
मिर्ची
लगेगी
करें
कुछ
तजरबा
नुक़्सान
का
भी
किसी
को
ये
भी
नाकामी
लगेगी
खुली
है
नींद
कुछ
ही
वक़्त
पहले
जगाती
हर
किरन
अच्छी
लगेगी
हसीं
मुझको
बना
दे
इक
नज़र
में
हसीना
वो
बड़ी
प्यारी
लगेगी
ज़रा
सी
याद
भी
काफ़ी
है
उसकी
इसी
में
ज़िंदगी
पूरी
लगेगी
मनाने
में
उसे
ज़्यादा
नहीं
कुछ
बिना
शक्कर
की
इक
कॉफ़ी
लगेगी
पुकारेगी
तुम्हारा
नाम
जब
वो
'धरम'
वो
ज़्यादा
ही
सोनी
लगेगी
- "Dharam" Barot
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मज़हब
नहीं
सिखाता
आपस
में
बैर
रखना
हिन्दी
हैं
हम
वतन
है
हिन्दोस्ताँ
हमारा
Allama Iqbal
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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तेरा
रुख़-ए-मुख़त्तत
क़ुरआन
है
हमारा
बोसा
भी
लें
तो
क्या
है
ईमान
है
हमारा
Meer Taqi Meer
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कितने
हसीं
हो
माशा-अल्लाह
तुम
पे
मोहब्बत
ख़ूब
जचेगी
Zubair Ali Tabish
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अल्लाह
अल्लाह
हुस्न
की
ये
पर्दा-दारी
देखिए
भेद
जिस
ने
खोलना
चाहा
वो
दीवाना
हुआ
Arzoo Lakhnavi
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'मीर'
के
दीन-ओ-मज़हब
को
अब
पूछते
क्या
हो
उन
ने
तो
क़श्क़ा
खींचा
दैर
में
बैठा
कब
का
तर्क
इस्लाम
किया
Meer Taqi Meer
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पहले
पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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अल्लाह
तेरे
हाथ
है
अब
आबरू-ए-शौक़
दम
घुट
रहा
है
वक़्त
की
रफ़्तार
देख
कर
Bismil Azimabadi
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ये
मय-कदा
है
यहाँ
हैं
गुनाह
जाम-ब-दस्त
वो
मदरसा
है
वो
मस्जिद
वहाँ
मिलेगा
सवाब
Ali Sardar Jafri
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इक
दिन
के
लिए
घर
को
परी-ख़ाना
बना
दे
अल्लाह
मुझे
उनका
ग़ुसल-ख़ाना
बना
दे
मोटी
है
बहुत
बीवी
तो
हुश्यार
रहा
कर
वो
मूड
में
आकर
तेरा
सुरमा
ना
बना
दे
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Paplu Lucknawi
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मर्ज़ी
बिन
उसकी
पत्ता
भी
नहीं
हिलता
अपना
माना
कैसे
अपनी
मर्ज़ी
से
"Dharam" Barot
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हारकर
हँसना
हुनर
है
खेल
का
जंग
में
बाज़ी
लगी
थी
जान
की
"Dharam" Barot
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साथ
होता
ही
नहीं
सब
का
यहाँ
हौसला
ही
साथ
होता
था
मेरा
"Dharam" Barot
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लौट
कर
परदेश
से
आना
मेरा
देश
लगता
है
मुझे
प्यारा
मेरा
ये
बहाना
भी
सही
होता
मेरा
है
नहीं
ग़म
से
अभी
नाता
मेरा
हाथ
बीवी
पर
उठे
तो
माँ
कहे
हाँ
ग़लत
होता
यहाँ
बेटा
मेरा
रात
को
ही
सिर्फ़
मतलब
हो
मेरा
फिर
फ़क़त
तू
जिस्म
ही
पाता
मेरा
ये
हवा
थी
और
था
वो
बस
मेरा
याद
से
ही
उस
सेे
था
नाता
मेरा
आप
आगे
बढ़
रहे
हो
है
सही
सीखना
होता
ग़लत
कैसा
मेरा
साथ
होता
ही
नहीं
सबका
धरम
हौसला
ही
साथ
में
बस
था
मेरा
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"Dharam" Barot
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निगाहें
फेरता
चौ-खूट
जाता
है
बहुत
कुछ
रास्ते
में
छूट
जाता
है
निभाना
है
निभाई
ये
भी
शिद्दत
से
न
कीजे
कोई
वा'दा
टूट
जाता
है
भरोसा
जीतने
के
बाद
होता
ये
ज़रूरत
को
समझकर
लूट
जाता
है
बुराई
देखता
हूँ
ख़ुद
की
जब
ख़ुद
ही
हया
से
आईना
भी
फूट
जाता
है
'धरम'
सबने
बताया
जीतता
है
सच
हराकर
फ़ख़्र
से
क्यूँ
झूट
जाता
है
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"Dharam" Barot
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