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"Dharam" Barot
rakh li meri laaj hokar beqaraar
rakh li meri laaj hokar beqaraar | रख ली मेरी लाज होकर बेक़रार
- "Dharam" Barot
रख
ली
मेरी
लाज
होकर
बेक़रार
इश्क़
में
लगती
है
ठोकर
बेक़रार
शे'र
को
भी
करना
था
क़ाबू
में
आज
था
बहुत
सर्कस
में
जोकर
बेक़रार
आप
तो
कहके
चले
जाते
है
दुख
हो
गया
कोई
रो
रोकर
बेक़रार
हर
मुसीबत
झेलने
तैयार
जो
क्या
उन्हें
लगनी
थी
ठोकर
बेक़रार
अब
सताता
डर
घरों
में
चोर
का
रखने
को
सोना
था
लोकर
बेक़रार
देख
कर
मुझको
कसीनो
आया
याद
खेलने
को
खेल
पोकर
बेक़रार
- "Dharam" Barot
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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उस
की
यादों
की
काई
पर
अब
तो
ज़िंदगी-भर
मुझे
फिसलना
है
Siraj Faisal Khan
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जब
बुलंदी
का
गुमाँ
था
तो
नहीं
याद
आई
अपनी
परवाज़
से
टूटे
तो
ज़मीं
याद
आई
वही
आँखें
कि
जो
ईमान-शिकन
आँखें
हैं
उन्हीं
आँखों
की
हमें
दावत-ए-दीं
याद
आई
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Subhan Asad
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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गले
से
लगते
ही
जितने
गिले
थे
भूल
गए
वगर्ना
याद
थीं
हम
को
शिकायतें
क्या
क्या
Abdul Rahman Ehsaan Dehlavi
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इतना
तो
याद
है
इक
वा'दा
किया
था
लेकिन
हम
ने
क्या
वा'दा
किया
था
हमें
ये
याद
नहीं
Bismil Dehlavi
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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ख़ुद
को
मसरूफ़
किए
रखने
की
कोशिश
करना
क्या
तेरी
याद
के
ज़ुमरे
में
नहीं
आता
है
Jawwad Sheikh
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वीडियो
कॉल
कर
दिन
निकालें
जी
आप
मोह
पाला
है
पैसों
का
परदेस
में
"Dharam" Barot
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दिनों
में
क्यूँ
गिनूँगा
इश्क़
का
दुख
चुना
है
उम्र
भर
का
इश्क़
का
दुख
जिसे
ये
था
समझना
वो
न
समझा
किसी
से
क्या
जताना
इश्क़
का
दुख
हमारे
बाद
भी
आएँगे
'आशिक़
सभी
का
हो
सहारा
इश्क़
का
दुख
जिसे
मिलता
नहीं
दो
वक़्त
खाना
उसे
कुछ
और
ही
था
इश्क़
का
दुख
नहीं
जब
कोई
समझेगा
'धरम'
तब
समझ
आएगा
है
क्या
इश्क़
का
दुख
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"Dharam" Barot
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गुज़ारी
जाए
ऐसी
ज़िंदगी
कान्हा
करूँँ
बस
मैं
तेरी
ही
बंदगी
कान्हा
"Dharam" Barot
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लोग
भूखे
हैं
मोहब्बत
के
यहाँ
पर
बेच
नफ़रत
क्यूँ
रहे
हो
तुम
जहाँ
पर
बाँट
दोगे
इस
जहाँ
को
दो
धड़ों
में
फिर
बताओ
अम्न
आना
है
कहाँ
पर
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"Dharam" Barot
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दो
लड़
रहे
मुल्कों
में
से
कैसा
चुनाव
इंसानियत
को
मार
हिंसा
का
चुनाव
"Dharam" Barot
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