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Deep kamal panecha
zameen se falak se sabhi se
zameen se falak se sabhi se | ज़मीं से फ़लक से सभी से
- Deep kamal panecha
ज़मीं
से
फ़लक
से
सभी
से
नफ़स
हैं
मिरी
शा'इरी
से
तू
ही
हाँ
तू
ही
सिर्फ़
तू
ही
सभी
रम्ज़
भी
हैं
तुझी
से
चमक
चाँदनी
सा
नहीं
मैं
मिरा
रब्त
है
सादगी
से
मैं
क्यूँ
रोज़
ये
ठानता
हूँ
हैं
मंसूब
होना
उसी
से
वो
सारे
इश्क़
पर
है
लानत
जो
रखते
है
वहशत
सभी
से
मैं
निकलूँगा
इक
रोशनी
बन
मैं
ख़ुद
अपनी
ही
तीरगी
से
बताऊँगा
पुर-ख़ूबसूरत
लिखूँगा
सुख़न
चाँदनी
से
हुनर
हैं
नहीं
हारने
का
लगाऊँगा
दिल
दिल-लगी
से
- Deep kamal panecha
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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कोई
तो
पूछे
मोहब्बत
के
इन
फ़रिश्तों
से
वफ़ा
का
शौक़
ये
बिस्तर
पे
क्यूँ
उतर
आया
Harsh saxena
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कितना
झूठा
था
अपना
सच्चा
इश्क़
हिज्र
से
दोनों
ज़िंदा
बच
निकले
Prit
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हासिल
नहीं
हुआ
है
मोहब्बत
में
कुछ
मगर
इतना
तो
है
कि
ख़ाक
उड़ाना
तो
आ
गया
Amaan Haider
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जँचने
लगा
है
दर्द
मुझे
आपका
दिया
बर्बाद
करने
वाले
ने
ही
आसरा
दिया
कल
पहली
बार
लड़ने
की
हिम्मत
नहीं
हुई
मुझको
किसी
के
प्यार
ने
बुजदिल
बना
दिया
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Kushal Dauneria
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यानी
अब
उसकी
मुहब्बत
का
हलफ़
माँगूँ
मैं
यानी
अब
सुर्ख़
लबों
पे
मैं
सियाही
फेंकूँ
anupam shah
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कभी
कभी
तो
झगड़ने
का
जी
भी
चाहेगा
मगर
ये
जंग
मोहब्बत
से
जीती
जाएगी
Amaan Abbas Naqvi
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मोहब्बत
में
नहीं
है
फ़र्क़
जीने
और
मरने
का
उसी
को
देख
कर
जीते
हैं
जिस
काफ़िर
पे
दम
निकले
Mirza Ghalib
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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तुम्हीं
से
प्यार
मुझको
इसलिए
है
ज़माना
आज़मा
कर
आ
गया
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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इश्क़
का
बस
यही
तो
मज़ा
है
हिज्र
के
बाद
मिलती
क़ज़ा
है
मौत
से
ख़ौफ
थोड़ी
है,
आए
अब
तो
बे-इश्क़
ये
ही
रज़ा
है
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Deep kamal panecha
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हम
तो
वो
हैं
कोई
हम
को
चाहता
ही
है
नहीं
चाहते
भी
हम
यही
है
कोई
हम
को
चाहे
ही
न
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बारिश
ये
इतनी
हँस
रही
है
तो
सही
हर
एक
बादल
में
नमी
है
तो
सही
आलम
ये
मेरी
आरज़ू
ही
तो
है
एक
ये
आरज़ू
मेरी
सजी
है
तो
सही
बेचैन
बैठा
हूँ
मैं
इस
तन्हाई
में
इस
में
तुम्हारी
इक
कमी
है
तो
सही
अच्छा
मुहब्बत
आह
इक
बीमारी
हैं
बीमारी
ये
मुझ
को
लगी
है
तो
सही
क्या,
"दीप"
को
वहशी
कहा
है
तुम
ने
ही
बुद्धि
तुम्हारी
ये
सही
है
तो
सही
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ये
नई
चादर
जो
लाई
जा
रही
है
तेरे
बिस्तर
पे
बिछाई
जा
रही
है
ख़ुश
है
ना
तू
ग़ैर
रिश्ते
में
तभी
बससज
ये
तेरी
सजाई
जा
रही
है
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आज
दिल
में
करारी
नईं
इश्क़
पे
ए'ति
बारी
नईं
एक
तरफा
ही
रोता
रहा
आई
क्यूँँ
उसकी
बारी
नईं
इस
तरह
आग
दिल
में
लगी
''जौन''
से
भी
करारी
नईं
आसमाँ
चाँद
तारे
तो
हैं
तेरी
बाद-ए-बहारी
नईं
मैंने
इतना
लिखा
तुम
पे
हैं
क्यूँँ
गुमाँ
तुम्हें
आरी
नईं
ज़िन्दगी
तो
बहुत
लंबी
हैं
बे-तिरे
अब
गुज़ारी
नईं
तुम
कभी
मेरी
थी
सच
हैं
ये
और
ये
भी
की
सारी
नईं
इतना
कुछ
हैं
बताया
तूने
पर
कहीं
पे
ख़ुदारी
नईं
बस
भरोसा
उठा
तो
उठा
जान
अब
तुम
हमारी
नईं
हैं
ज़ियादा
सुकूँ
"जैन"
से
ज़ीस्त
खूँ
तो
थुकारी
नईं
कोई
ग़म
क्यूँँ
नहीं
यूँँ
लगे
ज़िंदगी
आज़मारी
नईं
कुछ
हुआ
हैं
मिरे
साथ
में
तेरी
यादें
सतारी
नईं
ग़म
मैं
अंदर
ही
रखता
हूँ
याँ
अश्क़
ग़म
की
सवारी
नईं
अब
तू
लायक
नहीं
हैं
मिरे
"दीप"
की
जाँ
तुम्हारी
नईं
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