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Chetan
itnaa samjho na zindagaani ko
itnaa samjho na zindagaani ko | इतना समझो न ज़िंदगानी को
- Chetan
इतना
समझो
न
ज़िंदगानी
को
ऊब
जाने
के
बाद
याँ
कुछ
नइँ
- Chetan
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इस
मिलन
की
रात
का
अब
क्या
करें
जो
मिली
उस
मात
का
अब
क्या
करें
हम
तुझे
अपना
बनाने
चल
दिए
लौटी
घर
बारात
का
अब
क्या
करें
हाथ
थामा
क्यूँ
नहीं
तुमने
मेरा
याद
की
ख़ैरात
का
अब
क्या
करें
छोड़
जाते
हैं
ग़रीबी
में
सभी
लिखने
वाले
ज़ात
का
अब
क्या
करें
आदतन
जलते
रहे
जो
उम्र
भर
मौसमी
बरसात
का
अब
क्या
करें
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किसे
है
पता
नाप
इस
ज़ीने
का
मिला
है
सहारा
कई
कीने
का
इजाज़त
नहीं
थी
मुझे
मरने
की
मुझे
शौक़
अब
था
नहीं
जीने
का
उसे
प्यार
की
आग
में
जलना
था
यहाँ
बर्फ़
सा
भार
है
सीने
का
नज़र
में
कभी
थी
मोहब्बत
मगर
अभी
वक़्त
है
अश्क
ही
पीने
का
किसे
देख
कर
मैं
सुधारा
करूँँ
पिघलने
लगा
अक्स
आईने
का
बदलने
लगे
वक़्त
के
साथ
सब
बिगड़ता
रहा
हाल
तख़मीने
का
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मुझको
दिल
से
निकालने
वाले
ज़ेहन
पे
कैसा
हक़
जमाता
है
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तेरी
मंज़िल
पे
आ
गए
हैं
हम
अब
तेरी
राह
छोड़नी
होगी
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जाने
कैसी
वो
मौत
थी
जिस
सेे
आत्म
हत्या
की
तो
बचा
था
वो
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