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Bhoomi Srivastava
zaraa sii chot par meri uthaata tha jo parvat
zaraa sii chot par meri uthaata tha jo parvat | ज़रा सी चोट पर मेरी उठाता था जो पर्वत
- Bhoomi Srivastava
ज़रा
सी
चोट
पर
मेरी
उठाता
था
जो
पर्वत
ज़माने
हो
गए
हैं
उस
ने
आलम
तक
न
पूछा
- Bhoomi Srivastava
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बिछड़े
तो
रख
रखाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
ताज़ा
किसी
को
घाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
बस
देख
कर
ही
उसको
परिंदे
उतर
गए
उसको
तो
आओ
आओ
भी
करना
नहीं
पड़ा
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Azbar Safeer
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यूँँ
न
क़ातिल
को
जब
यक़ीं
आया
हम
ने
दिल
खोल
कर
दिखाई
चोट
Fani Badayuni
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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ज़िन्दगी,
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे,
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
से
ज़ख़्मों
के
निशां
थे
फिर
वहीं
पे
चोट
मारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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तुम्हारी
याद
के
जब
ज़ख़्म
भरने
लगते
हैं
किसी
बहाने
तुम्हें
याद
करने
लगते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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है
ये
कैसा
सितम
मौला
ये
हैं
दुश्वारियाँ
कैसी
जहाँ
पर
रोना
था
हमको
वहीं
पर
मुस्कुराना
है
Aqib khan
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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दिल
बना
दोस्त
तो
क्या
क्या
न
सितम
उस
ने
किए
हम
भी
नादां
थे
निभाते
रहे
नादान
के
साथ
Shakeel Badayuni
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ये
दिल
इक
पत्थर
हो
सकता
है
इस
से
भी
बदतर
हो
सकता
है
उल्फ़त
के
जंगल
में
मत
फँसना
मजनूँ
भी
अजगर
हो
सकता
है
तुम
जौहर
जैसे
मैं
मुक्ता
सी
दोनों
में
अंतर
हो
सकता
है
दुनिया
नज़रों
पर
काम
करें
तो
किन्नर
भी
अफ़सर
हो
सकता
है
चिमटे
वाले
हाथों
में
कॉपी
ये
प्यारा
मंज़र
हो
सकता
है
गुलशन
को
देखूँ
तो
लगता
है
ये
तुझ
सा
सुंदर
हो
सकता
है
जो
ग़म
पी
रक्खा
मय-ख़ाने
में
ऐसे
भी
बाहर
हो
सकता
है
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Bhoomi Srivastava
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मैं
नफ़रत
उस
से
कैसे
कर
लूँ
जिस
ने
मुझे
काँटे
हटाकर
गुल
दिए
हैं
Bhoomi Srivastava
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सुनाए
बहुत
शे'र
उल्फ़त
के
उन
को
वो
पर
इक
इशारा
हमारा
न
समझे
Bhoomi Srivastava
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ये
समुंदर
ग़ालिबन
औरत
के
अश्कों
से
बने
हैं
ये
जहाँ
सदियों
से
औरत
को
रुलाता
आ
रहा
है
Bhoomi Srivastava
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ठीक
है
बात
मत
करो
लेकिन
इक
नज़र
हमको
देखते
जाओ
Bhoomi Srivastava
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