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Abhishek Bhadauria 'Abhi'
be-dard zamaane men dua kisko chahiye
be-dard zamaane men dua kisko chahiye | बे-दर्द ज़माने में दु'आ किसको चाहिए
- Abhishek Bhadauria 'Abhi'
बे-दर्द
ज़माने
में
दु'आ
किसको
चाहिए
सब
मांगते
हैं
दर्द,
दवा
किसको
चाहिए
- Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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खुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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ग़म-ए-दुनिया
भी
ग़म-ए-यार
में
शामिल
कर
लो
नश्शा
बढ़ता
है
शराबें
जो
शराबों
में
मिलें
Ahmad Faraz
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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दिल
ना-उमीद
तो
नहीं
नाकाम
ही
तो
है
लंबी
है
ग़म
की
शाम
मगर
शाम
ही
तो
है
Faiz Ahmad Faiz
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उनके
दुखों
को
शे'र
में
कहना
तो
था
मगर
लड़के
समझ
न
पाएँ
कभी
लड़कियों
का
दुख
Ankit Maurya
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न
आया
ग़म
भी
मोहब्बत
में
साज़गार
मुझे
वो
ख़ुद
तड़प
गए
देखा
जो
बे-क़रार
मुझे
Asad Bhopali
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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वफ़ा
तुम
से
करेंगे
दुख
सहेंगे
नाज़
उठाएँगे
जिसे
आता
है
दिल
देना
उसे
हर
काम
आता
है
Arzoo Lakhnavi
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फिर
वहीं
देखो
‘अभी’
लाया
है
ये
नसीब
छोड़
कर
हमको
जहाँ
क़िस्मत
गई
थी
Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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यूँँ
तो
हम
ख़ुश
सभी
से
रहते
हैं
पर
ख़फ़ा
भी
किसी
से
रहते
हैं
मेरी
इन
तीरगी
सी
आँखों
में
ख़्वाब
कुछ
रौशनी
से
रहते
हैं
एक
जंगल
ही
है
ये
शहर
जहाँ
जानवर
आदमी
से
रहते
हैं
मेरे
अंदर
नहीं
उदास
कोई
मेरे
ग़म
भी
ख़ुशी
से
रहते
हैं
दश्त
भी
सूखता
नहीं
देखो
पेड़
भी
तिश्नगी
से
रहते
हैं
आश्ना
थे
कभी
जो
लोग
वो
अब
अजनबी
अजनबी
से
रहते
हैं
देखना
है
हमें
कि
ज़िंदा
‘अभी’
कितने
दिन
शा'इरी
से
रहते
हैं
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Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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कोई
भी
काम
ऐसा
क्यूँँ
करें
हम
भला
ग़ैरों
पे
ग़ुस्सा
क्यूँँ
करें
हम
Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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नाम
उसके
ये
ज़िंदगी
की
है
अपने
दुश्मन
से
दोस्ती
की
है
यार
फंदा
बना
ख़यालों
का
मैंने
ग़ज़लों
में
ख़ुद-कुशी
की
है
मेरे
दिल
की
सियाह
रातों
में
तेरी
यादों
ने
रौशनी
की
है
बात
अपनी
न
कह
सका
मैं
जब
तब
कहीं
जाके
शा'इरी
की
है
इश्क़
करना
न
अब
किसी
से
भी
दिल
ने
ख़्वाहिश
ये
आख़िरी
की
है
मुद्दतों
बाद
मेरे
कमरे
में
एक
ख़ुशबू
ने
वापसी
की
है
झूठ
पर
झूठ
बोलता
हूँ
अब
देख
तेरी
बराबरी
की
है
इक
वही
बात
उस
सेे
कहनी
थी
उसने
जो
बात
अन-सुनी
की
है
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Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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कभी
ऐसा
भी
होता
था
बहुत
ही
फूल
खिलते
थे
मगर
अब
दिल
का
बगीचा
ज़रा
वीरान
रहता
है
Abhishek Bhadauria 'Abhi'
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