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Ashutosh Kumar "Baagi"
dard-e-dil kii davaa keejie
dard-e-dil kii davaa keejie | दर्द-ए-दिल की दवा कीजिए
- Ashutosh Kumar "Baagi"
दर्द-ए-दिल
की
दवा
कीजिए
गर
न
हो
तो
दु'आ
कीजिए
इश्क़
गर
हो
तो
क्या
कीजिए
या
ख़ुदा
या
ख़ुदा
कीजिए
इश्क़
की
इंतिहा
कीजिए
अश्क
आब-ए-बक़ा
कीजिए
हाँ
नहीं
ये
अगर
वो
मगर
साफ़
मुँह
पर
मना
कीजिए
आपने
की
थी
हम
सेे
वफ़ा
थोड़ा
ख़ौफ़-ए-ख़ुदा
कीजिए
अब
तबीअत
ज़रा
ठीक
है
ज़ख़्म
कोई
अता
कीजिए
वस्ल
की
बात
पर
ये
कहा
अपनी
हद
में
रहा
कीजिए
मैं
हूँ
फ़ुर्क़त
का
मारा
हुआ
मेरे
मुँह
मत
लगा
कीजिए
यार
दुनिया
ये
अच्छी
नहीं
मेरे
दिल
में
रहा
कीजिए
आप
बेशर्म
ठहरे
मगर
झूठी
मूठी
हया
कीजिए
जीते
जी
ख़ुल्द
मिल
जाएगा
शेख़
साहब
पिया
कीजिए
- Ashutosh Kumar "Baagi"
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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जब
भी
उस
कूचे
में
जाना
पड़ता
है
ज़ख़्मों
पर
तेज़ाब
लगाना
पड़ता
है
उसके
घर
से
दूर
नहीं
है
मेरा
घर
रस्ते
में
पर
एक
ज़माना
पड़ता
है
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Subhan Asad
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चोट
खाई
थी
एक
बार
मगर
उम्र
भर
को
बिखर
गए
हैं
हम
Munazzah Noor
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बिछड़े
तो
रख
रखाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
ताज़ा
किसी
को
घाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
बस
देख
कर
ही
उसको
परिंदे
उतर
गए
उसको
तो
आओ
आओ
भी
करना
नहीं
पड़ा
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Azbar Safeer
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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सुख़न
का
जोश
कम
होता
नहीं
है
वगरना
क्या
सितम
होता
नहीं
है
भले
तुम
काट
दो
बाज़ू
हमारे
क़लम
का
सर
क़लम
होता
नहीं
है
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Baghi Vikas
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छोड़
कर
जाने
का
मंज़र
याद
है
हर
सितम
तेरा
सितमगर
याद
है
अपना
बचपन
भूल
बैठा
हूँ
मगर
अब
भी
तेरा
रोल
नंबर
याद
है
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Salman Zafar
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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वो
बड़े
प्यार
से
कहते
हैं
कि
आप
अपने
हैं
और
अपनों
को
ही
तो
ज़ख़्म
दिए
जाते
हैं
Akash Rajpoot
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जफ़ा
जो
कर
सके
बदले
वफ़ा
के
मोहब्बत
उसके
दर
सज्दा
करेगी
Ashutosh Kumar "Baagi"
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इश्क़
है
इक
ज़हरीला
साँप
ख़ुशियाँ
खाकर
जीता
है
Ashutosh Kumar "Baagi"
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किसकी
बारी
है
अब
मियाँ
मुझ
में
कौन
लेता
है
हिचकियाँ
मुझ
में
काश
मंज़िल
कोई
मुझे
कहता
सबको
दिखती
हैं
सीढ़ियाँ
मुझ
में
रोज़
किरदार
एक
मरता
है
टूटी
रहती
हैं
चूड़ियाँ
मुझ
में
क़ब्र
हूँ
और
चलती
फिरती
हूँ
दफ़्न
कितनी
हैं
सिसकियाँ
मुझ
में
क़ुर्बतों
का
सिला
मिला
ऐसा
रह
गईं
हैं
तो
दूरियाँ
मुझ
में
मैं
तो
कमज़र्फ़
एक
सहरा
हूँ
ढूँढ़ती
है
वो
सीपियाँ
मुझ
में
गर्मियों
में
मुझे
वो
छोड़
गया
जिसने
काटी
थीं
सर्दियाँ
मुझ
में
इश्क़
के
फूल
जो
खिले
मुझ
में
छोड़
दी
हिज्र
बकरियाँ
मुझ
में
तुग़लक़ी
हुक्म
उसके
आते
हैं
फिर
उजड़ती
हैं
दिल्लियाँ
मुझ
में
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Ashutosh Kumar "Baagi"
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बस
यही
बात
मुझको
खलती
है
क्यूँँ
भला
साँस
मेरी
चलती
है
एक
रस्ता
है
ख़ुद-कुशी
अब
तो
अब
ये
वहशत
नहीं
सँभलती
है
हाए
ये
चाँद
क्यूँँ
नहीं
मरता
हाए
ये
धूप
क्यूँँ
निकलती
है
इश्क़
आता
नहीं
कभी
तन्हा
इक
उदासी
भी
साथ
चलती
है
मेरी
बाहों
में
जो
बहलती
थी
किसकी
बाहों
में
अब
मचलती
है
पाँव
में
बाँध
कर
नई
पायल
ख़ामुशी
छत
पे
क्यूँँ
टहलती
है
जुगनुओं
तुम
ही
मुझको
बतलाओ
रात
कपड़े
कहाँ
बदलती
है
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Ashutosh Kumar "Baagi"
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इतनी
कमियाँ
निकाली
लोगों
ने
अब
फ़क़त
ख़ूबियाँ
बचीं
मुझ
में
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Ashutosh Kumar "Baagi"
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